मै बून्द बून्द बढ़ता रहा,
ख्वाहिशों की मटकी सा,
मै बून्द बून्द रिसता भी रहा
तला मटकी का छलकता ही रहा
बून्द बून्द नमी माटी समोती रही
माटी का था, गल कर ही रहा
सफर में जिंदगी की,
कितने मटके मै बदलता ही रहा
सारिका आशुतोष मूंदड़ा
ख्वाहिशों की मटकी सा,
मै बून्द बून्द रिसता भी रहा
तला मटकी का छलकता ही रहा
बून्द बून्द नमी माटी समोती रही
माटी का था, गल कर ही रहा
सफर में जिंदगी की,
कितने मटके मै बदलता ही रहा
सारिका आशुतोष मूंदड़ा