Tuesday, November 11, 2014

मै बून्द बून्द बढ़ता रहा,
ख्वाहिशों की मटकी सा,
मै बून्द बून्द रिसता भी रहा
तला मटकी का छलकता ही रहा
बून्द बून्द नमी माटी समोती रही
माटी का था, गल कर ही रहा
सफर में जिंदगी की,
कितने मटके मै बदलता ही रहा
सारिका आशुतोष मूंदड़ा

Wednesday, July 16, 2014

स्वागत में तेरे किन शब्दों का चयन करूँ
दमकती दामिनी में ओझल होता चाँद कहूँ
या कि तेरी आहट पर मोर का थाप चुनूं
प्यासी प्रकृति की मुस्कराहट का आगाज सुनूँ
या इंद्रधनुषी छटाओं में कश्तियों के कुछ ख्वाब बुनूँ
सत्कार में तेरे तुझ पर आ,माटी की महक मलूँ
पंख खोल रही घटाओं की धरती तक उड़ान लिखूँ
गहना अम्बर से पाकर वसुधा का श्रृंगार रचूँ
गूंजता है जो जलतरंगों पर,दिल के वो अल्फाज कहूँ
बंधनों में फंसी आत्मा की,मुक्त होती परवाज़ भरूँ
स्वागत में तेरे किन शब्दों का चयन करूँ............

सारिका आशुतोष मूंदड़ा


Tuesday, July 1, 2014

ये पर,ये घर,ये स्पर्श.............

 उड़ाने तो असीम हैं तुम्हारी,
 कहाँ है मगर तुम्हारे पर.............
 क्या झूला बनती शाखाओं में,
 या खुशबुओं के विसरण में,
 या जलधि से जलद के विस्तार तक
 चहुँ दिशा में पसरे हुए
 या कहीं अत्यंत सूक्ष्म से
 श्वास के आवागमन में
 विरले हैं तुम्हारे पर....................
 ढूंढने से भी मिलते नहीं
 आखिर कहाँ है तुम्हारे घर............
 क्या इस मिटटी से पल्लवित जीवन में
 या जल की सहज,निर्बाध गति में,
 या रोशनी संजोये इस नभ में,
 अनंतता दर्शाते हुए,
 या कहीं संकुचित से
 प्राणो के चेतन-अवचेतन में,
 बहुआयामी हैं तुम्हारे घर................
 आभासी है पर दिखते नहीं
 अदृश्य हैं तुम्हारे स्पर्श.........
 कभी रेतीले बादलों में छुपे हुए,
 कभी सर्दी में दांत किटकिटाते हुए
 कभी माटी की सौंधी खुशबू लुटाते हुए
 हर मौसम में विलीन से
 पर मात्र अनुभवशील से,
 जीवन के लय-विलय में,
 निष्ठुर हैं तुम्हारे स्पर्श.............
 कितने विचित्र हैं 'हवा'.............
 ये पर,ये घर,ये स्पर्श.............
 सर्वव्यापक भी, कभी कैदी भी
 अनंत भी कभी शुन्य भी
 सतत विध्यमान पर अदृश्य भी.
 जैसे तुम हो साक्षात ईश्वर ही.............

 सारिका आशुतोष मूंदड़ा

Sunday, May 11, 2014

माँ

माँ
सुर-ताल भी तुम हो
लयबद्ध शब्द भी तुम हो
आधार गीत हो तुम जीवन का
माँ
रूपों और गुणों की खान हो तुम
बच्ची सी चंचल,कभी सहेली सी हमराज
कभी गुरु सी पथ-प्रदर्शक हो तुम
माँ
कुछ भी शब्द लिखूं,कम ही होगा
तेरे प्यार को बयान कर सके कहीं
कोई ऐसा आखिर कहाँ होगा

सारिका आशुतोष मूंदड़ा

Friday, April 18, 2014

यूँ लगता है अब...........














जाने कितने एहसासों में,
खिलता है ये जीवन
इन भावनाओं के पुष्पों में
तुम्हारी सुगंध का ये कैसा रिश्ता है...........
कभी संवरती,कभी बिखरती
इस अविरल यात्रा में,
तुमसे शायद
मुस्कान और दर्द का रिश्ता है
आशा-निराशा के भंवर में,
जब झूलती है नैय्या
तब तुमसे शायद ,
उम्मीद के तिनकों का रिश्ता है
कभी देखा नहीं तुम्हे,
और एक छवि सी उभरी है
मन के नैनों का, तुम पर........
विशवास का ये, कैसा अजब सा रिश्ता है
नक़्शे तो सब अधूरे से,
तुम तक आती राहों के,
यूँ लगता है अब,
हर दिशा का बस तुमसे रिश्ता है

सारिका आशुतोष मूंदड़ा

Saturday, April 5, 2014

जीवन २ .................

असंख्य,अद्वितीय किरदार युक्त कथा
हर शक्ल जुदा,हर शख्सियत जुदा
हर किरदार कथा कहता सा.......
आस्तिक-नास्तिक,संस्कार,विश्वास,
सुख-दुःख,मान-अपमान,
उड़ानों और सीमाओं की
स्वपरिभाषा गढ़ते हुए..................
क्रोध,तृष्णा,जलन पिपासा
दया,क्षमा,मोह ममता
प्यार, नफरत,आशा-निराशा
जाने कितने बंधनों में जकड़े हुए.............
कर्मफल -बीज को अंकुरित करते हुए
प्रति पल कुछ पाते हुए,कुछ खोते हुए
सबकी अपनी यात्रा
अपना-अपना सफ़र,मगर............
मगर,एक ही मंजिल पर बढ़ते हुए
निज अस्तित्व की कहानी रचते हुए
अनुभव-यात्रा समापन कर शुन्य से एकाकार होते हुए
                                             
                                                  [ लगातार ]
सारिका आशुतोष मूंदड़ा

Thursday, April 3, 2014

जीवन.............

दुनिया..........
जिंदगी.........
जीवन................एक सिनेमा
एक या अनेक .............
रोचक या नीरस
कैसी कहानी
या कितनी कहानियाँ लिखी है
कथाकार ने............
और क्या ये  सब मिल कर
कहीं फिर,
निर्मित हो रही एक नयी कहानी
ना उत्पत्ति का पता
न अंत का........
विलीनता भी है आगमन भी
दुःख भी,उल्लास भी
कई रोचक घटनाक्रम भी
सतत प्रवाहमान कथा...............

                         [लगातार ..].
सारिका आशुतोष मूंदड़ा

Thursday, March 6, 2014

रूह..........















बड़ी आस सजाती है प्रतिदिन,
भीतर से कहीं दूर तलक जाती है
काया-पट से निकल के,रूह..........
अपने रंग की तलाश में जाती है
ढूंढती है रंगरेज पारखी
रंगरेजों के बाजार में
नहीं मिलता कोई अनुभवी,
थक-हार के आ जाती है
फिर दुनिया के तमाशगाह में
पुनः उम्मीद संजोती है
कहीं अंदर से झांकती है
नूर ए रंग की तलाश में.............

सारिका आशुतोष मूंदड़ा

Tuesday, March 4, 2014

नहीं मिल पाया...........पुनः कोई राम


















राम-राज्य बना सुघड़ बेशक,
सीता का मगर आहत था मान
निर्मिति चाही होगी ऐसे शासन की,
ना हो किसी सीता का फिर अपमान
तुम जैसे कहाँ है राघव,मगर............
जनता के दिलो- मस्तिष्क सुजान
नाम लेकर मर्यादा पुरुषोत्तम
तुम्हारा, शक-बीज पा रहा विस्तार
पहले एक थी सीता केवल,
आज कितनों के दामन आया तिरस्कार
व्यर्थ ही चुना खुद पर आघात को,
स्वयं का जीवन भी किया वीरान
होंगे एक अच्छे राजा तुम बेशक,
जन-मानसिकता का कर ना पाये भान
कल्पना राम राज्य की,देखो............
साथ तुम्हारे ही पा गयी विश्राम
आज तक नहीं मिल पाया
इस वसुधा को पुनः कोई राम
पुनः कोई राम..................
सारिका आशुतोष मूंदड़ा

Sunday, March 2, 2014

एक प्रार्थना अधरों पर...........
















तिमिर भरे मन में ,
आस -दीप जुगनू बने
विशवास हुआ खंड-खंड,
पुनः वो टुकड़े जुड़े
उजड़े घोसले को जैसे,
ख्वाब के तिनके सिले
नया गीत लिखने,
शब्दों के धुंधले अक्स मिले
एक प्रार्थना अधरों पर,
सबको तेरा साथ मिले
जुगनू शक्ल ले लौ की
विश्वास को सम्बल मिले
ख्वाब रंग ले हकीकत का,
धुंधलाहट को रोशनी दिखे

सारिका आशुतोष मूंदड़ा

Friday, February 28, 2014

आस का झरना

















तिमिर युक्त मन में,
आस की लौ जलाते हो तुम
विशवास पकड़ हमारा,
उस राह ले जाते हो तुम
पतझड़ में उजड़े वृक्ष पर,
हरियाली का झुरमुट लगते हो तुम
कहती है 'अनुभूति',
स्नेह का झरना,ऐ मेरे मालिक
सहज,अविरल,सर्वदा
हम तक पहुंचाने को 'आतुर' हो तुम

सारिका आशुतोष मूंदड़ा

Thursday, February 27, 2014

दर्द गुनगुनाइए..........













         गुनगुनाना है तो दर्द को भी गुनगुनाइए
भीतर जो है सुषुप्त सी ............. उस गजल को जगाइए
       पथ काँटों का है तो भी चलते जाइये
सुर्ख रंग की लालिमा से.............गुलाब कोई खिलाइये
        तपिश आती है मिटाने  वजूद अक्सर
पिघलते वक़्त भी............हो सके  कोई चिराग जलाइए
           
                 सारिका आशुतोष मूंदड़ा 

Wednesday, February 26, 2014

जिंदगी.......

हर लम्हे के साथ,
सपनों की मुट्ठी से 
फिसल रही है जिंदगी.......
हर शख्स बैठा है,
कुछ अधूरे सपनों, 
कुछ हकीकतों के ढेर पर,
सोचता है फिर भी,
आशाओं की मरीचिका में,
कभी तो मुकम्मल रूप,
आखिर लेगी जिंदगी...........
भूल जाता है अक्सर,
मुकम्मल मिलती नहीं कभी ये,
मुकम्मल बनानी पड़ती है जिंदगी..........
सारिका आशुतोष मूंदड़ा

Tuesday, February 25, 2014

कैसे विहंग है............

                                                                                                     

                                            आ ही जाते हैं ,
                                                 चाहे-अनचाहे .........
                                                      कितना शोर किया करते हैं
                                             मुक्त करने की,
                                                  कोशिश में.............
                                                      और जकड़ा करते हैं
                                             कैसे विहंग है,
                                                   जो बंधन में.............
                                                        सुख समझा करते हैं
                                             यादों के पखेरू
                                                    अक्सर उड़ान 
                                                        मेरे इर्द-गिर्द भरा करते हैं
                                                 
                                                          सारिका आशुतोष मूंदड़ा

Wednesday, February 19, 2014

क्या ये धर्म है ?


फिर कहीं,
आग लगी है मानवता को,
फिर धर्म,
घी बनकर सुलग रहा है
फिर से, 
मजहब के नाम पर
झुलस गयी,
रूह एक मासूम कली की
वो मासूम,
जिसे धर्म क्या है ?नहीं पता है
आखिर किसने,
पशुता को धर्म कहा है?

सारिका आशुतोष मूंदड़ा

Thursday, February 6, 2014

कशमकश

आज फिर से वही प्रश्न सुमन के मस्तिष्क में उठ रहा था कि क्यों?बेटियां ही क्यों?ऐसा नहीं कि ये प्रश्न पहले नहीं उठे कभी या उसने पूछे नहीं.पूछे थे ,कई बार पूछे थे,जवाब भी मिलते थे,पर कोई भी जवाब उसे संतुष्ट नहीं कर पाया था.पर आज ,आज जवाब जानने कि तीव्र उत्कंठा थी उसके मन के भीतर ,जैसे सवालों की नदी बह रही हो किसी समंदर में मिलने के लिए ,पर अपना समंदर उसे खुद ही ढूँढना होगा
                              ऐसी हलचल सी क्यों थी उसके हृदय में?एक वेदना थी उसके दिल में जो जवाब ढूंढ़ ही लेती है. आज... ,आज उसे भी अपने ही घर को पराया सुनने का गरम शीशा अपने कान में डालना था.कैसे मान ले कोई भी बेटी कि  जो घर उसकी  आवाज की खनक के बिना सुनसान होता है आज वो खनक परायी हो गयी,क्योंकि दुनिया की रीत है और इसलिए बनी कि नारी का वजूद पुरुष के समक्ष उन्नीस है इसलिए इस त्याग की अपेक्षा नारी से ही की जाती है.पर आज के जमाने की नारी को ऐसे जवाबों से कहाँ संतुष्टि मिल सकती थी
           एक अजीब सी मनोदशा है सुमन कि कुछ सपने आने वाले जीवन के और कुछ यादों का सफ़र जो तय किया था उसे पीछे छोड़ना और इस  परिवर्तन में मुस्कान को संजोकरनए सांचे में खुद को ढालना था और न केवल ढलना बल्कि ढलते वक़्त होने वाले बदलाव में ,अपने परिवार का मान संजोना.क्या इतनी सामर्थ्य किसी पुरुष में है कि किसी के लिए अपने जीवन को बदल ले,और कुछ इस तरह बदल ले कि पुराने सांचे का मान रह जाए और ये अपेक्षा हर बेटी से  की  जाती है क्योंकि मिटटी बदलेगी तो बदलाव तो आयेंगे ही.पुरुष और नारी में इतना सामर्थ्यवान कौन है ?ये शक्ति तो नारी का सहज गुण है जो प्रकृति प्रदत्त हैऔर जब भी वो खुद का पुनर्जन्म करती है ये दुनिया नारी को उन्नीस कह के या कमतर कह के न केवल  उसकी शक्ति को अनदेखा करती है वरन पुरुष प्रधानता सिद्ध करती है  क्या किसी पुरुष के लिए ये कार्य इतना सहज होगा,जितनी सहजता से ये उत्तरदायित्व बेटियाँ निभा पाती है?नहीं शायद  कभी नहीं..............स्वतः ही सुमन का सर न के लिए हिल गया था और इस विचार मंथन में अनायास ही उसने समंदर ढूंढ़ लिया था.अपने आंसुओं की नदी में निहित ऊर्जा को उसने पा लिया था जैसे किसी मृग को कस्तूरी की तलाश हो और उसे वो मिल जाए .
आज उसकी माँ की आँखों में हैरानी थी की आज उसने क्यों नहीं पूछा कि क्यों ?आखिर क्यों बेटियां विदा होती आयी है संसार में?माँ की इस बैचनी से कैसे अनभिज्ञ रह पाती बेटी, उसने खुद ही कहा ............
एक पग आगे बुलाता है,
एक पग पीछे खींचता है
विदाई का ये पल, 
ऐसा क्यों होता है?
जिस ख़ुशी का पता नहीं 
उसके लिए,जो है..................
उसे क्यों खोना पड़ता है
क्यों अपनों से दूर ,
बेटियों को होना पड़ता है?
आँखों में सपने भी होते हैं,
और आंसुओं की नदी भी,
इस नदी को छुपाना होता है
सपनो के बहाव में.........
ऐसा कर पाना होता है.............
बस बेटी के स्वभाव में
इसीलिए ना माँ ,इसीलिए बेटियां 
विदा होती आयी हैं संसार मे

सारिका आशुतोष मूंदड़ा


Thursday, January 23, 2014

कैसे हो सकता है वो, हमारे सपनो का भारत?

उत्थान के नए सूर्योदय से अगर,
लुप्त हो जाए आदर्शों कि चमक
कैसे हो सकता है वो,
हमारे सपनो का भारत?
उन्नति का मानदंड हो केवल रुपया
चरित्र और मूल्यों का हास हो रहा,
ये कैसे हो सकता है,
गांधीजी का भारत?
यूँ तो पूजा जाता है कन्या -शक्ति को
और सहमी रहती हो जहाँ माँएं,
ये नहीं हो सकता
गौरवान्वित सा भारत
जो प्रखर-शक्ति है समाज की नीव की
वही युवा दिशाभ्रमित हो रहे यहाँ पर
क्या ये बना पाएंगे ,
बोस,आजाद,भगत सिंह का भारत?
राजनीती में लोप हो गया 'नीति का
स्वहित सर्वोपरि हुआ लोकहित से,
कैसे उड़ान भर पायेगा
शास्त्रीजी,पटेल का भारत?
जहाँ होती थी आत्मा पथ-प्रदर्शक कभी,
लथपथ है स्वार्थ के कीचड़ में अब जो,
कैसे बन पायेगा देश
विवेकानंद,टेरेसा का भारत?
साम्य हो पाये यदि मूल्यों और प्रगति का,
तब ही,केवल तब ही,स्वर्णिम इतिहास,
भावी पीढ़ी के लिए ,
लिख पायेगा भारत
आत्मा रूपी पहियों पर,लगाम नैतिकता की थाम के,
जो कर्म-रथ अग्रसर हो,शिखर के मार्ग पर,
विश्व -गुरु का पद,
पुनः पा सकता है भारत
सारिका आशुतोष मूंदड़ा 

Friday, January 17, 2014

लम्हा लम्हा सरकता रहा,
एक राह के संवारने को,
हर पल एक ईट बनता रहा,
राह के किनारे सजाता रहा

और .......................
कभी बना एक कुंआ आंसुओं का,
कभी सीढ़ियां बनी शरारतों की
कभी सज गयी मीनारें हंसी की,
कभी बने गुम्बद मासूमियत के,
इमारतें बनती गयी,रंग हमसे चुनती गयी,
लम्हे खिसकते गए,
जो भी बना ,जैसा भी बना,
बीत गया,............
हौले हौले खिसकता गया......
जैसे जल में अपना अक्स हुआ
छूना जिसे नामुमकिन हुआ

लम्हा लम्हा अब भी सरक रहा है
हर पल फिर एक ईट रख रहा है,
किनारे अब भी सज रहे हैं,
और सजावट के रंग ,
हम खुद ही तो चुन रहे हैं
तेजोमय या डबडबाये से,
कभी हंसी ,कभी आंसू के,
रंग भर रहे हैं
इमारतों की नीव ,
हम ही तो रख रहे हैं
पल जो भी है ,चला ही जाएगा
अपना अक्स फिर नजर आएगा
अक्स जैसा चाहिए,
रंग वैसा भरना होगा
दर्द भरोगे तो दर्द से मिलना होगा
हंसी भरोगे तो मुस्कान से मिलना होगा
चुनाव तो आखिर हमे ही करना होगा

सारिका आशुतोष मूंदड़ा