Wednesday, July 16, 2014

स्वागत में तेरे किन शब्दों का चयन करूँ
दमकती दामिनी में ओझल होता चाँद कहूँ
या कि तेरी आहट पर मोर का थाप चुनूं
प्यासी प्रकृति की मुस्कराहट का आगाज सुनूँ
या इंद्रधनुषी छटाओं में कश्तियों के कुछ ख्वाब बुनूँ
सत्कार में तेरे तुझ पर आ,माटी की महक मलूँ
पंख खोल रही घटाओं की धरती तक उड़ान लिखूँ
गहना अम्बर से पाकर वसुधा का श्रृंगार रचूँ
गूंजता है जो जलतरंगों पर,दिल के वो अल्फाज कहूँ
बंधनों में फंसी आत्मा की,मुक्त होती परवाज़ भरूँ
स्वागत में तेरे किन शब्दों का चयन करूँ............

सारिका आशुतोष मूंदड़ा


Tuesday, July 1, 2014

ये पर,ये घर,ये स्पर्श.............

 उड़ाने तो असीम हैं तुम्हारी,
 कहाँ है मगर तुम्हारे पर.............
 क्या झूला बनती शाखाओं में,
 या खुशबुओं के विसरण में,
 या जलधि से जलद के विस्तार तक
 चहुँ दिशा में पसरे हुए
 या कहीं अत्यंत सूक्ष्म से
 श्वास के आवागमन में
 विरले हैं तुम्हारे पर....................
 ढूंढने से भी मिलते नहीं
 आखिर कहाँ है तुम्हारे घर............
 क्या इस मिटटी से पल्लवित जीवन में
 या जल की सहज,निर्बाध गति में,
 या रोशनी संजोये इस नभ में,
 अनंतता दर्शाते हुए,
 या कहीं संकुचित से
 प्राणो के चेतन-अवचेतन में,
 बहुआयामी हैं तुम्हारे घर................
 आभासी है पर दिखते नहीं
 अदृश्य हैं तुम्हारे स्पर्श.........
 कभी रेतीले बादलों में छुपे हुए,
 कभी सर्दी में दांत किटकिटाते हुए
 कभी माटी की सौंधी खुशबू लुटाते हुए
 हर मौसम में विलीन से
 पर मात्र अनुभवशील से,
 जीवन के लय-विलय में,
 निष्ठुर हैं तुम्हारे स्पर्श.............
 कितने विचित्र हैं 'हवा'.............
 ये पर,ये घर,ये स्पर्श.............
 सर्वव्यापक भी, कभी कैदी भी
 अनंत भी कभी शुन्य भी
 सतत विध्यमान पर अदृश्य भी.
 जैसे तुम हो साक्षात ईश्वर ही.............

 सारिका आशुतोष मूंदड़ा