स्वागत में तेरे किन शब्दों का चयन करूँ
दमकती दामिनी में ओझल होता चाँद कहूँ
या कि तेरी आहट पर मोर का थाप चुनूं
प्यासी प्रकृति की मुस्कराहट का आगाज सुनूँ
या इंद्रधनुषी छटाओं में कश्तियों के कुछ ख्वाब बुनूँ
सत्कार में तेरे तुझ पर आ,माटी की महक मलूँ
पंख खोल रही घटाओं की धरती तक उड़ान लिखूँ
गहना अम्बर से पाकर वसुधा का श्रृंगार रचूँ
गूंजता है जो जलतरंगों पर,दिल के वो अल्फाज कहूँ
बंधनों में फंसी आत्मा की,मुक्त होती परवाज़ भरूँ
स्वागत में तेरे किन शब्दों का चयन करूँ............
सारिका आशुतोष मूंदड़ा
दमकती दामिनी में ओझल होता चाँद कहूँ
या कि तेरी आहट पर मोर का थाप चुनूं
प्यासी प्रकृति की मुस्कराहट का आगाज सुनूँ
या इंद्रधनुषी छटाओं में कश्तियों के कुछ ख्वाब बुनूँ
सत्कार में तेरे तुझ पर आ,माटी की महक मलूँ
पंख खोल रही घटाओं की धरती तक उड़ान लिखूँ
गहना अम्बर से पाकर वसुधा का श्रृंगार रचूँ
गूंजता है जो जलतरंगों पर,दिल के वो अल्फाज कहूँ
बंधनों में फंसी आत्मा की,मुक्त होती परवाज़ भरूँ
स्वागत में तेरे किन शब्दों का चयन करूँ............
सारिका आशुतोष मूंदड़ा