उड़ाने तो असीम हैं तुम्हारी,
कहाँ है मगर तुम्हारे पर.............
क्या झूला बनती शाखाओं में,
या खुशबुओं के विसरण में,
या जलधि से जलद के विस्तार तक
चहुँ दिशा में पसरे हुए
या कहीं अत्यंत सूक्ष्म से
श्वास के आवागमन में
विरले हैं तुम्हारे पर....................
ढूंढने से भी मिलते नहीं
आखिर कहाँ है तुम्हारे घर............
क्या इस मिटटी से पल्लवित जीवन में
या जल की सहज,निर्बाध गति में,
या रोशनी संजोये इस नभ में,
अनंतता दर्शाते हुए,
या कहीं संकुचित से
प्राणो के चेतन-अवचेतन में,
बहुआयामी हैं तुम्हारे घर................
आभासी है पर दिखते नहीं
अदृश्य हैं तुम्हारे स्पर्श.........
कभी रेतीले बादलों में छुपे हुए,
कभी सर्दी में दांत किटकिटाते हुए
कभी माटी की सौंधी खुशबू लुटाते हुए
हर मौसम में विलीन से
पर मात्र अनुभवशील से,
जीवन के लय-विलय में,
निष्ठुर हैं तुम्हारे स्पर्श.............
कितने विचित्र हैं 'हवा'.............
ये पर,ये घर,ये स्पर्श.............
सर्वव्यापक भी, कभी कैदी भी
अनंत भी कभी शुन्य भी
सतत विध्यमान पर अदृश्य भी.
जैसे तुम हो साक्षात ईश्वर ही.............
सारिका आशुतोष मूंदड़ा
कहाँ है मगर तुम्हारे पर.............
क्या झूला बनती शाखाओं में,
या खुशबुओं के विसरण में,
या जलधि से जलद के विस्तार तक
चहुँ दिशा में पसरे हुए
या कहीं अत्यंत सूक्ष्म से
श्वास के आवागमन में
विरले हैं तुम्हारे पर....................
ढूंढने से भी मिलते नहीं
आखिर कहाँ है तुम्हारे घर............
क्या इस मिटटी से पल्लवित जीवन में
या जल की सहज,निर्बाध गति में,
या रोशनी संजोये इस नभ में,
अनंतता दर्शाते हुए,
या कहीं संकुचित से
प्राणो के चेतन-अवचेतन में,
बहुआयामी हैं तुम्हारे घर................
आभासी है पर दिखते नहीं
अदृश्य हैं तुम्हारे स्पर्श.........
कभी रेतीले बादलों में छुपे हुए,
कभी सर्दी में दांत किटकिटाते हुए
कभी माटी की सौंधी खुशबू लुटाते हुए
हर मौसम में विलीन से
पर मात्र अनुभवशील से,
जीवन के लय-विलय में,
निष्ठुर हैं तुम्हारे स्पर्श.............
कितने विचित्र हैं 'हवा'.............
ये पर,ये घर,ये स्पर्श.............
सर्वव्यापक भी, कभी कैदी भी
अनंत भी कभी शुन्य भी
सतत विध्यमान पर अदृश्य भी.
जैसे तुम हो साक्षात ईश्वर ही.............
सारिका आशुतोष मूंदड़ा
अच्छी है
ReplyDeleteपर मेरे लिए थोड़ा कठिन है