Thursday, January 23, 2014

कैसे हो सकता है वो, हमारे सपनो का भारत?

उत्थान के नए सूर्योदय से अगर,
लुप्त हो जाए आदर्शों कि चमक
कैसे हो सकता है वो,
हमारे सपनो का भारत?
उन्नति का मानदंड हो केवल रुपया
चरित्र और मूल्यों का हास हो रहा,
ये कैसे हो सकता है,
गांधीजी का भारत?
यूँ तो पूजा जाता है कन्या -शक्ति को
और सहमी रहती हो जहाँ माँएं,
ये नहीं हो सकता
गौरवान्वित सा भारत
जो प्रखर-शक्ति है समाज की नीव की
वही युवा दिशाभ्रमित हो रहे यहाँ पर
क्या ये बना पाएंगे ,
बोस,आजाद,भगत सिंह का भारत?
राजनीती में लोप हो गया 'नीति का
स्वहित सर्वोपरि हुआ लोकहित से,
कैसे उड़ान भर पायेगा
शास्त्रीजी,पटेल का भारत?
जहाँ होती थी आत्मा पथ-प्रदर्शक कभी,
लथपथ है स्वार्थ के कीचड़ में अब जो,
कैसे बन पायेगा देश
विवेकानंद,टेरेसा का भारत?
साम्य हो पाये यदि मूल्यों और प्रगति का,
तब ही,केवल तब ही,स्वर्णिम इतिहास,
भावी पीढ़ी के लिए ,
लिख पायेगा भारत
आत्मा रूपी पहियों पर,लगाम नैतिकता की थाम के,
जो कर्म-रथ अग्रसर हो,शिखर के मार्ग पर,
विश्व -गुरु का पद,
पुनः पा सकता है भारत
सारिका आशुतोष मूंदड़ा 

Friday, January 17, 2014

लम्हा लम्हा सरकता रहा,
एक राह के संवारने को,
हर पल एक ईट बनता रहा,
राह के किनारे सजाता रहा

और .......................
कभी बना एक कुंआ आंसुओं का,
कभी सीढ़ियां बनी शरारतों की
कभी सज गयी मीनारें हंसी की,
कभी बने गुम्बद मासूमियत के,
इमारतें बनती गयी,रंग हमसे चुनती गयी,
लम्हे खिसकते गए,
जो भी बना ,जैसा भी बना,
बीत गया,............
हौले हौले खिसकता गया......
जैसे जल में अपना अक्स हुआ
छूना जिसे नामुमकिन हुआ

लम्हा लम्हा अब भी सरक रहा है
हर पल फिर एक ईट रख रहा है,
किनारे अब भी सज रहे हैं,
और सजावट के रंग ,
हम खुद ही तो चुन रहे हैं
तेजोमय या डबडबाये से,
कभी हंसी ,कभी आंसू के,
रंग भर रहे हैं
इमारतों की नीव ,
हम ही तो रख रहे हैं
पल जो भी है ,चला ही जाएगा
अपना अक्स फिर नजर आएगा
अक्स जैसा चाहिए,
रंग वैसा भरना होगा
दर्द भरोगे तो दर्द से मिलना होगा
हंसी भरोगे तो मुस्कान से मिलना होगा
चुनाव तो आखिर हमे ही करना होगा

सारिका आशुतोष मूंदड़ा