जाने कितने एहसासों में,
खिलता है ये जीवन
इन भावनाओं के पुष्पों में
तुम्हारी सुगंध का ये कैसा रिश्ता है...........
कभी संवरती,कभी बिखरती
इस अविरल यात्रा में,
तुमसे शायद
मुस्कान और दर्द का रिश्ता है
आशा-निराशा के भंवर में,
जब झूलती है नैय्या
तब तुमसे शायद ,
उम्मीद के तिनकों का रिश्ता है
कभी देखा नहीं तुम्हे,
और एक छवि सी उभरी है
मन के नैनों का, तुम पर........
विशवास का ये, कैसा अजब सा रिश्ता है
नक़्शे तो सब अधूरे से,
तुम तक आती राहों के,
यूँ लगता है अब,
हर दिशा का बस तुमसे रिश्ता है
सारिका आशुतोष मूंदड़ा