Thursday, March 6, 2014

रूह..........















बड़ी आस सजाती है प्रतिदिन,
भीतर से कहीं दूर तलक जाती है
काया-पट से निकल के,रूह..........
अपने रंग की तलाश में जाती है
ढूंढती है रंगरेज पारखी
रंगरेजों के बाजार में
नहीं मिलता कोई अनुभवी,
थक-हार के आ जाती है
फिर दुनिया के तमाशगाह में
पुनः उम्मीद संजोती है
कहीं अंदर से झांकती है
नूर ए रंग की तलाश में.............

सारिका आशुतोष मूंदड़ा

Tuesday, March 4, 2014

नहीं मिल पाया...........पुनः कोई राम


















राम-राज्य बना सुघड़ बेशक,
सीता का मगर आहत था मान
निर्मिति चाही होगी ऐसे शासन की,
ना हो किसी सीता का फिर अपमान
तुम जैसे कहाँ है राघव,मगर............
जनता के दिलो- मस्तिष्क सुजान
नाम लेकर मर्यादा पुरुषोत्तम
तुम्हारा, शक-बीज पा रहा विस्तार
पहले एक थी सीता केवल,
आज कितनों के दामन आया तिरस्कार
व्यर्थ ही चुना खुद पर आघात को,
स्वयं का जीवन भी किया वीरान
होंगे एक अच्छे राजा तुम बेशक,
जन-मानसिकता का कर ना पाये भान
कल्पना राम राज्य की,देखो............
साथ तुम्हारे ही पा गयी विश्राम
आज तक नहीं मिल पाया
इस वसुधा को पुनः कोई राम
पुनः कोई राम..................
सारिका आशुतोष मूंदड़ा

Sunday, March 2, 2014

एक प्रार्थना अधरों पर...........
















तिमिर भरे मन में ,
आस -दीप जुगनू बने
विशवास हुआ खंड-खंड,
पुनः वो टुकड़े जुड़े
उजड़े घोसले को जैसे,
ख्वाब के तिनके सिले
नया गीत लिखने,
शब्दों के धुंधले अक्स मिले
एक प्रार्थना अधरों पर,
सबको तेरा साथ मिले
जुगनू शक्ल ले लौ की
विश्वास को सम्बल मिले
ख्वाब रंग ले हकीकत का,
धुंधलाहट को रोशनी दिखे

सारिका आशुतोष मूंदड़ा