बड़ी आस सजाती है प्रतिदिन,
भीतर से कहीं दूर तलक जाती है
काया-पट से निकल के,रूह..........
अपने रंग की तलाश में जाती है
ढूंढती है रंगरेज पारखी
रंगरेजों के बाजार में
नहीं मिलता कोई अनुभवी,
थक-हार के आ जाती है
फिर दुनिया के तमाशगाह में
पुनः उम्मीद संजोती है
कहीं अंदर से झांकती है
नूर ए रंग की तलाश में.............
सारिका आशुतोष मूंदड़ा
बहुत खूब
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