Wednesday, April 12, 2023

 कहानी - विश्वास के अदृश्य पंख ( अभिनव इमरोज में प्रकाशित )


भोर ? ये भोर ही है ना एक-एक कदम जो भोर आगे की ओर बढ़ा रही थी,एक बार तो निशि अवाक सी उसे देखती रह गयी ,अपनी आँखों पर उसे विश्वास  ही नहीं हो पा रहा था अभी कुछ महीनों से ही तो भोर को देखने का लगातार चलता सिलसिला थमा था आज भी जो मिलना हुआ था तो छुट्टी के कारण डॉ. ने जो अलग समय दिया था उसकी बदौलत ,और निशि जो देख रही थी ,यकीं नहीं कर पा रही थी ,मगर मन से एक आवाज मानो बार बार पूछ रही थी कि क्यों,क्यों नहीं हो सकता निशि ?तुमने तो  स्वयं देखा है ,हर्षिता को पल पल भोर के प्रति समर्पित,कोशिश करते हुए ,फिर क्यों नहीं ? तुम्हे चमत्कार लग रहा है न ?  कह लो ,अक्सर ऐसा ही तो कहते हैं सब ,कोई कोई ही समझ पाता है कि करिश्मे यूँ ही नहीं हो जाते रोजाना किये गए प्रयास ही किसी करिश्मे का आकार ग्रहण करते हैं अब उसके अंतर्मन में अपनेआप ही मंथन होने लगा था 

       किसी चलचित्र की भाँति घूम गए बीते चार साल,जब हर्षिता से वो पहली बार मिली थी यहीं इसी जगह पर  इसी जगह माने स्पीच थेरेपिस्ट के यहां ,जहाँ बच्चे बोलने जैसी साधारण प्रक्रिया के लिए जूझते हैं ,उसकी बेटी को भी तो वक्त ने इस सफर के लिए चुना था ,जब और बच्चे मजे से खेलते हैं बोलते हैं और इन बच्चों को नियम से डॉ.के पास जाना होता है ,एक्सरसाइज करवानी होती है ताकि ये भी इन
शब्दों की भाषा बोल सकें और इस आने जाने में होने वाली थकान के बाद पढ़ना या खेलना सब कुछ बड़ा बोझिल सा हो जाता है ,सहज सी दिखने वाकई प्रक्रियाएं अगर असहज हो जाएँ तो कितनी तकलीफ होती है  क्या अजब कि यहाँ पर  हर माँ के चेहरे पर परेशानी दिखे  मगर हर्षिता को इन सालों में बिलकुल अपने नाम के अनुरूप ही पाया था ,हर्ष से परिपूर्ण,बाहरी परिस्थितियां जिसे चुरा नहीं सकती ,यहीं पर उससे जो पहली झलक  मिली  थी ,आज भी ज्यों कि त्यों मानस पटल पर अंकित हैं | चेहरे  पर सौम्य भाव,शांति और किताब पढ़ने में व्यस्त ,किताब भी कोई कहानी,उन्यास आदि नहीं,बच्चों के विकास और मनोवैज्ञानिकता से सम्बंधित  वहां और भी लोग थे ,मगर सबके चेहरे और बातों से सिर्फ परेशानी और निराशा के रंग बिखर रहे थे और ये सबसे अनभिज्ञ अपनी दुनिया में खोयी सी ,ये इतनी अलग कैसे,ये तो तब भी सोचा था न मैंने और स्वयं को एक आश्वासित करता सा उत्तर भी दे डाला था  कम परेशानी होगी इनके बच्चे को  पर इसका उत्तर बहुत शीघ्र ही मेरे सम्मुख आने वाला था |  स्पीच थेरेपी के बारे में ज्यादा जानकारी मुझे थी नहीं ,तो मै सबसे बात करके अपने भीतर की माँ को शायद आश्वस्त कर रही थी जानकारी सहेज कर --आप कब से आ रहे हैं? क्या प्रॉब्लम है? फर्क है या नहीं ? आदि आदि अपने इसी क्रम को आगे बढाते हुए मैं ही हर्षिता  की ओर  उन्मुख थी 
हेल्लो मेरा नाम निशी है 
हाय मेरा नाम हर्षिता  
आप यहाँ किसी के ट्रीटमेंट के लिये. ..
हाँ ,मेरी बेटी भोर 
क्या प्रॉब्लम है उसे ,कब से आ रही हैं ,फर्क है ..?
मैं तीन साल से आ रही हूँ , उसकी बॉडी लो टोन है 
मेरे चेहरे पर नासमझी के भाव देख कर फिर वो बोली लो  टोन मतलब  की वो  खाना चबा नही  सकती,उसे लिक्विड फॉर्म में देना होता है उसकी बॉडी में ताकत नहीं है ,अभी कुछ दिनों  से सेमी सॉलिड  फूड शुरु किया है ,कुछ शब्द बोल रही है अब  (चेहरे पर मुस्कान लिए वो बोली )
फर्क है, थोड़ा वक्त और लगेगा (आश्वस्त भाव उनके चेहरे पर था)
ओ.के.
उन्होंने जो बताया उसे सुन कर मेरी सोच में यही आया कि तीन सालों से आप आ रही हैं और कितना वक्त ...?
 मगर उनके शब्दों और चेहरे पर  जो आशा थी उसने मेरी  प्रश्नवाचक मुद्रा को परे कर दिया |  उनहोने फिर मेरी परी के बारे में पुछा  | फिर वो किताब पढने में और मैं सालों लम्बी थेरपी के विचारों में गुम हो गए |
     ईश्वर कभी कभी बहुत जल्दी उत्तर देता है  मैने जो  ये सोचा था  कि इनकी बेटी को ज्यादा दिक्कत नहीं होगी  उसका उत्तर वैसे तो काफी हद तक मिल ही गया था मगर मानो ईश्वर को मेरा ऐसा सोचना रास नहीं आया था तो जैसे कह रहे हों ले देख इनकी कम परेशानी...
          थेरपी  खत्म होने के बाद जब वो बेटी को बाहर लायी तो झटका  ही तो था वो उसकी गोद में लगभग छ  साल की , दुबली पतली ,आँखों पर बड़ा सा चश्मा लगाए , शरीर  पर कुछ अलग सी जेकेट ,पैरों में कुछ अलग जुते जो घूटनों से थोड़ा नीचे तक बांधे हुए थे उसके शरीर में एक ढ़ीलापन  सा था  हर्षिता  का थोड़ा भी हाथ हिला तो वो झूल जाती थी  कोई नियंत्रण नही था उसकी बॉडी पर, उसका हर्षिता की गोद में वो ऐसे दबकी हुई थी मानो पांच महीने  की हो,एक हाथ गर्दन  पर तो एक कमर  पर उसको संभाले हुए ,वो तो चली गयी मगर एक अजीब सा दर्द मेरे मन में घुल गया था
धीरे धीरे हर्षिता से मिलने का सिलसिला हफ्ते में तीन दिन तय हो गया था ,जितना उसे जानती गयी उतना ही उसके लिए सम्मान बढ़ता गया | कभी किसी सॉफ्टवेयर कंपनी  में काम करती थी मगर बेटी के जन्म के दो साल बाद सब कुछ बदल गया था इनके लिए,कभी किसी बात पर उसने कहा था कि  जब बच्चे स्वस्थ और इंटेलीजेंट होते हैं ,तो वो सबके होते हैं,अगर कोई कमी है तो वो सिर्फ माँ के होते हैं,इस बात से समझ सकती थी मैं की घर में  उसे किसी का सहयोग प्राप्त नहीं था शायद भोर को घर में ख़ुशी से अपनाया नहीं जा रहा था |
            फिर भी  उनकी बातों में एक ही सपना मुझे नज़र आता था की भोर  बोल सके ,अपने पैरों पर खड़ी हो सके ,मेरी परी को इतनी तकलीफ नही थी तो भी मैँ कभी-कभी निराश हो जाती थी फिर उनका इतना विश्वास और सपने देखना ...हैरत में ही डालता था ,भोर एक स्पेशल बच्ची थी ,उसकी इन्द्रिया गर्म ठंडे का ज्ञान  नही कर पाती थी उसे ये ज्ञान  हो इसलिये दो टिफिन  बना कर लाना ,ये भी थेरपी का एक हिस्सा था , ब्रश कराने  से लेकर खाना खिलाना सारे काम हर्षिता खुद कर रही थी , इसके अलावा स्कूल में भोर के साथ बैठना ,फिर थेरपी आना,फिर फिजियोथेरेपी जाना....सुबह से शाम तक घडी की सुइयों जैसे घूमता जीवन....
हर माँ के कुछ सपने होते हैं ,मगर कुदरत कितनी क्रूर होती है कई बार ,अक्सर हार्षिता को देख के  ये विचार आता ,जाने कितने सपने होंगे इसके पर आज चलने और बोलने के दायरे में ही सिमट गए से दिखते थे और ये भी मुझे तो रेगिस्तान में भटकते उस यात्री के से प्रतीत होते जो मृगतृष्णा में भटक रहा हो ,फिर भी हर्षिता को कभी परेशानी से ग्रस्त नही पाया, सिर्फ कर्म करते हुए देखा जिस भोर के शरीर में गुरूत्वाकर्षण के प्रति कोई प्रतिरोध नहीं था ,ज़िसके लिये सीधा बैठना और खड़े होना ही चुनौती से कम नहीं था वो चल सकेगी  ये सिर्फ संशय  को ही जन्म देता था | मगर एक माँ की आँखो में कभी संशय  नहीं था, उसे देख कर कर्म -योगी शब्द के मायने समझ में आते थे ,वो लीन थी अपनी कर्म साधना में ,  निरपेक्ष भाव से  , नकारात्मकता लेश मात्र भी नहीं थी ,थेरपी में जब खाली समय में बाकी लोग चिंता में लीन रहते ,वो अपनी किताबो में ,वो स्वयं  बेहतर और बेहतर और बेहतर बनती जा रही थी अपनी दिशा के करीब और करीब और करीब ..... है ना निशी , उसके अंतस   से ही मानो कोई आवाज गूंज उठी |
          चार सालों की इस साधना की तो तुम ही साक्षी हो तो क्यो ये संशय  ?  ,भोर के कदमों में उसकी माँ का विश्वास ही तो ताकत भर रहा है ,अब सारे संशय  दूर छिटक गए थे और शेष था एक विश्वास कि कोशिश के साथ सकारात्मक  व्यवहार हो  तो सब कुछ हो सकता है | भोर जो कभी लिक्विड फूड पर थी  आज बादाम खा पा रही है, बोलने भी लगी थी हाँ  ...थोड़ा रुक- रुक कर ,पर .....ये खाना ,बोलना एक बहुत बड़ी चुनौती ही थी  जो एक माँ के सतत  व सही दिशा में लिये गए प्रयासों से पार हो गयी |  अब  जब निशी भोर को देख रही थी कदम दर कदम बढते हुए, हर  कदम के  पीछे जो चेहरा उसे दिखायी दे रहा था ,जो सम्पूर्ण आभा से उजागार  था वो सिर्फ माँ शब्द के भाव से दीप्त था |
भोर की हर सफलता निशी में भी कहीं ना कहीं जुगनु सा कुछ  दमकाती ही रही  थी | मगर आज पल-पल सकारात्मक भाव से जीते हुए हर्षिता ने भोर में तो ताकत भरी  ही थी ,अंजाने ही निशी के भीतर  के निराशा के अंधकार को ना केवल मिटा दिया था वरन् अपना यही योगी भाव उसमे भी दीप्त  कर दिया था ,जहां किंचित मात्र  भी हताशा को स्थान नहीं था | अंततः निशि ने समझ लिया था पल-पल करके बीतते इस जीवन में आप अपने लिए तो निश्चित ही कुछ गढ रहे होते हो अनजाने ही शायद किसी के जीवन में रंग भी भर रहे होते हो और अब निशि भी स्वयं के जीवन को इस नए रंग से सराबोर कर हर्षिता को उसकी सफलता की बधाई देने उठ खड़ी हुई |




Saturday, March 13, 2021

मुझमें मीठा तू है ( पुस्तक समीक्षा)

 अगर कुछ मीठा पढने का मन हो तो पढ़िये मायामृग जी का 

 ' मुझमे मीठा  तू है '  , 77 कविताओं का खूबसूरत काव्य संग्रह वाकई  बहुत मीठा है ।  कृतज्ञता, दार्शनिकता के भावों के  रस से अंतरमन सिक्त हो जायेगा । वर्तमान समय मे कृतज्ञता के उदगार विलुप्त प्राय: हो चले हैं । प्रत्येक परिस्थिति के लिए समाज दोषी है , तो रोष ही रोष है ...अगर ऐसे  समय मे अपने परिवेश , प्रकृति रूपी ईश्वर के प्रति उपकृत दृष्टि से सराबोर पुस्तक पढने को मिले तो जिस आनन्द का अनुभव हो तो उसका तो कहना ही क्या ...

        कई वर्षों पूर्व अज्ञेय ने स्व अस्तित्ववाद को वाणी प्रदान की और  उसके महत्व को प्रतिपादित किया था ...क्या अस्तित्व की बात सिर्फ अधिकारों के लिए  है , क्या कर्तव्य का बोध हम विस्मृत कर चुके हैं , अगर  नहीं तो क्या हमने कभी टटोला स्वयं को .... 


     एक बार झांक लो भीतर 

     तुम्हारे पास नहीं है इस कमरे की चाबी 

     कोई जवाब आये तो भीतर से सुनना 


कभी सोचा इस प्रकृति को, इसके प्रति अपने कृतघ्नता पूर्ण व्यवहार को ....क्या कभी क्षमा मांगी ? तो मांगिये  कवि के साथ  क्योंकि क्षमा मांगना राहत देगा । वही चिर-परिचित उपमान मगर अर्थ का एक नया विस्तार ...ऐसा प्रतीत होता है वक्त की सीढियां  चढ कर अब व्यक्ति फुरसत  से नाप रहा है अपना हर कदम,अपनी हर सोच ...तभी तो कभी कह उठते हैं 'क्षमाप्रार्थी हूँ मैं " और कभी  खंगालते हैं अपने बड़े होने के दम्भ  को ....कविता 'मैं बड़ा ' में  तो अहम की पीडा से त्रस्त मानसिकता वाले व्यक्तियों के लिए मानो चिंतन युक्त औषधि ही दे दी है ...

  मुझसे तो बड़े हैं पेड़

  मै तप जाता हूँ ज़रा सी आँच मे 

  उनमें बढती जाती है छांव धूप के तेज होने के साथ 

  भीतर गहरी ठंडक होती तो हो सकता था छांव भर जीना 

..........

   बड़ा होने के लिए होना होता है ....पेड़,

   आसमान  ....धरती और नदी ...


कोई भी  लेखन तभी सार्थक होता है जब पाठक उससे जुड सके और  इस काव्य संग्रह मे कितनी ही बार ये प्रतीत होता है कि स्व मल्यांकन करने जो व्यक्ति बैठा है वो हम स्वयम् हैं , एक  सुनी हुई मगर उपेक्षित भाषा की ओर आप ध्यान खींचते हैं और शब्दावली तो बहुत ही सहज....मगर कब प्रकृति की भाषा आशीष देती हुई और राह सम्मुख रखते हुए गंभीर अर्थ धरने लगती है ,भान नहीं होता ।


भाषा हमेशा सुनी और पढ़ी  नहीं जाती 

छू कर कहा ,उस छोटे पौधे ने 

यह स्पर्श याद रखना ..हरे रहना सदा 

.................................................

हर सहमति एक संभावना है 

संभावना से  भरी है धरती की भाषा 

झुककर छूने से समझ आती है .....


सीमाओं मे बांधना या बंधना अक्सर नकारात्मक प्रतीत होता है ,मगर मनुष्य की सीमायें याद दिलाती एक कविता की पंक्तियां सकारात्मकता की ओर ले जाती हैं । अपनी सीमाओं, हदों को पहचान कर जो परिधि निर्मित होती है ,वो हमें असीम का दर्शन करने के लिए दृष्टि प्रदान करती है ।


आसमान भर फैला था मेरा गर्व ऊँचाईयों को छूने का 

मैने खंगाले सभी मुहावरे

ज़िनमे आसमान से  ऊँचा होने का अर्थ था 

पर आँख की हद से आगे नहीं जा सकता मेरा आकाश ...


सारिका आशुतोष मूंदड़ा

Friday, February 26, 2021

 विधा: फ़िल्म समीक्षा

फ़िल्म : एक रुका हुआ फैंसला


निर्माता ,निर्देशक : बासु चटर्जी 

वर्ष  :1986

संवाद  : रंजीत  कपूर 


कलाकार : दीपक  काजीर  केजरीवाल, अमिताभ  श्रीवास्त्व,    पंकज कपूर, एस . एम . जहीर, सुभाष उदगत, हेमंत मिश्रा, एम .के . रेना, के. के . रेना, अन्नु कपूर, सुब्बिरज ,शेलेन्द्र गोयल ,अजीज कुरेशी  ,सी . डी . सिंधु 


समय : 2:06:09


"एक रुका हुआ फैसला" ,वास्तव मे एक दृष्टि है न्याय को हर कसौटी पर परखने की ,फैसले को रोकने की दृष्टि जब तक कि परिस्थिति के हर पहलू को तौल ना लिया जाए ।

   मूलत : हॉलीवुड फिल्म '12 एंग्री मैन' से  प्रेरित ये फिल्म कई बार मंचित भी हुई है ।फिर बासु चटर्जी ने इस पर फिल्म बनाई। फिल्म की शुरुआत कुछ इस प्रकार होती है ,ज़िसमे जनता मे से 12 लोगों को चुनकर एक ज़िम्मेदारी दी जाती है ,कि  वे पूर्ण मत से एक फैसला करे कि  उन्नीस वर्षीय लड़के ने अपने बाप का कत्ल किया है या नही । इस तरीके  से फैसला लेने का प्रारूप भारतीय न्याय व्यवस्था सम्मत नहीं है ,अत: काल्पनिक है ,मगर फिर भी शुरुआत से ही फिल्म दर्शकों  को बांधने मे पूरी तरह सक्षम है , ज़िज्ञासा बनी रहती है कि  आगे क्या, अब क्या ....?

    ग्यारह सदस्य एकमत से  प्रस्ताव पारित करते हैं बिना समय लिए उसके दोषी होने का ,वहीं एक सदस्य (नंबर 8 , के .के. रेना ) उसे बेकसूरवार कह के सब के गुस्से का तो पात्र बनते ही हैं, और दुविधा ये कि  अपनी बात साबित करने के लिए उनके पास कोई ठोस आधार  भी नही है । बस ये एक कोशिश मात्र है कि  बात की जाए ,विमर्श किया जाए । बाकी सदस्य जहां लड़के की पृष्ठभूमि और गवाहों के आधार पर उसे दोषी साबित करना चाहते हैं ,वहीं नंबर 8 उसकी पृष्ठभूमि को सहानुभूति की नजर से  देखते हैं । निर्णय तब तक नहीं हो सकता ,जब तक सब एकमत ना हों और फिर यही से शुरू होता है तथ्यों के अवलोकन, परिस्थितियों के विश्लेषण का ज़िज्ञासा व कौतूहल पूर्ण सफर ...

     संवाद किसी भी फिल्म मे महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं ,इस फिल्म की तो जान ही संवाद हैं ,क्योंकि पूरा फिल्मांकन केवल एक कमरे मे किया गया है ,कत्ल के समय की परिस्थिति ,घर का दृश्य ,गवाहों की भूमिका, चाकू आदि की स्थिति सब संवादों के सहारे ही एक बिंब बनाते हैं ,बस झलक भर ही गवाहों को दिखाया गया है ।

      संक्षेप मे कहा जाए तो कैसे ' एक रुका हुआ फैंसला' एक फैसले तक आता है ,ये देखना बहुत रोचक है ,किसी की जान से ज्यादा फैसला लेने की जल्दी इसलिये  हो कि  'मशाल' फिल्म देखने जाना है ,या इसलिये कि  वो निम्न तबके का है तो दोषी है ही या कोई ओर उसमे अपने बेटे को देखे ....................तो फिर ये सफर केवल इस केस  का सफर नही रह जाता ,वरन मनोविज्ञान ,संवेदना ,तर्क ,न्याय के प्रति पूर्वाग्रह ,दुरूहता, आपसी वैमनस्य कई रास्तों से गुजरने का सफर बन जाता है ।

      सारे कलाकारों ने बहुत अच्छी अदाकारी की है , विशेष तौर पर पंकज कपूर, के . के . रेना और अन्नु कपूर  ने । हॉ,जिनको गाने बहुत पसंद हैं ,वो मायूस हो सकते हैं क्योंकि इस फिल्म  मे एक भी गाना नही है और  वाकई फिल्म  मे गाने के लिए कोई जगह भी नही है । कुल मिलाकर एक बहुत कसी हुई फिल्म  बासु  चटर्जी ने निर्देशित की है । लीक से हटकर कुछ देखने का शौक जिन्हे है, उनको तो ये बहुत ही पसंद आयेगी, और बाकी दर्शकों के लिए भी निश्चय ही एक अच्छा अनुभव। 


सारिका आशुतोष मूंदड़ा

Monday, February 22, 2021

मल्लिका

 

मल्लिका ....मनीषा कुलश्रेष्ठ द्वारा रचित इस उपन्यास के दुसरे संस्करण  में लेखिका ने कहा है कि इसके लिखने के  बाद वो बहुत समय तक कुछ और नहीं लिख पायी , शायद वो 'राईटर्स ब्लाक' की अवस्था में आ गयी थी | उपन्यास को पढकर प्रतीत होता है कि ऐसा होना कोई अचरज की बात भी  नहीं थी | इस उपन्यास को पढ़कर पाठक स्वयं एक अलग परिवेश में पहुँच जाता है | लगभग १६० बरस पीछे ...

उपन्यास जिसके इर्द-गिर्द केन्द्रित है - वो है मल्लिका का  किरदार ,  | मल्लिका का चरित्र वास्तविक है और उनके दूर के भाइयों में बंकिम चन्द्र चटर्जी का नाम भी शामिल है | जिनसे मल्लिका साहित्य के बारे में जानकारी प्राप्त करती रहती हैं , बचपन से ही किताबें पढने की शौक़ीन मल्लिका का गाँव में ये शौक इन्ही चन्द्र भैया के प्रयासों से सफलता प्राप्त करता है | वो एक बाल विधवा हैं | वो बंगाल के मेदिनीपुर के केशोपुर गाँव में कन्या विद्यालय खोलना चाहती हैं , जिसके लिए स्वयं शिक्षा ग्रहण कर रही हैं मल्लिका अपना जीवन गुजारने के नाम पर किसी के भी साथ विवाह नहीं करना चाहती और घर वालों की प्रतिदिन की चर्चा से परेशान हो वो चन्द्र भैया की मदद से काशी आ जाती हैं | काशी में विधवा आश्रम या अकेली विधवा के रहने की कल्पना उस समय भी आसान नहीं थी , लेकिन कुछ जानकारों की मदद से वो ये संभव कर  पायी  | मल्लिका हिंदी सिखने के लिए प्रयासरत थी , उन्हें संस्कृत एवं बांग्ला का ज्ञान भली प्रकार था | ये मल्लिका की किस्मत ही थी कि उनके घर के पास  ही भारतेंदु का घर था – जिन्हें हिंदी साहित्य का पितामह कहा जाता है  | धीरे-धीरे परिचय , फिर हिंदी सिखने का क्रम , फिर काव्य -गोष्ठियों में उनका सम्मिलित होना ...एक ओर है  साहित्यिक यात्रा और और दूसरी ओर है भारतेंदु और मल्लिका का एक दुसरे से बढ़ता जुड़ाव जो कि  भारतेंदु द्वारा संपादित पत्रिकाओं में भी दिखने लगता है -‘हरिश्चन्द्रिका भारतेंदु हरिश्चंद्र का हरीश और मल्लिका का ही दूसरा नाम है चंद्रिका | 

मल्लिका ऐतिहासिक दृष्टि से भी अत्यंत मुख्य पात्र के रूप में उभरता है – जिसने सर्वप्रथम भारतेंदु को अनुवाद विधा से परिचित कराया , उन्होंने बांग्ला से हिंदी में उपन्यास अनुदित किये | लेकिन हिंदी साहित्य में मल्लिका को ये श्रेय मिलना अभी शेष है | इस उपन्यास की लेखिका ने नि:संदेह  उस प्राचीन परिवेश को  पाठक के समक्ष उपस्थित करने में सफलता प्राप्त की है | उस समय की जीवन शैली , बंगाली , ब्रज और तत्कालीन भाषा प्रयोग की झलकियाँ , प्रकाश व्यवस्था के लिए लैंप आदि की व्यवस्था , भारतेंदु के जीवन के विविध आयाम , विधवाओं की स्थिति , हमारे समाज में फैले अंध-विश्वास सब कुछ कथानक में  घुल सा  गया है , अनिर्बान के रूप में उस समय देश की आजादी को अपना लक्ष्य बनाने वाले युवाओं  के जीवन के त्याग  और समर्पण को यहाँ देखा जा सकता है | 

 भारतेंदु और मल्लिका की प्रेम कहानी पर आधारित ये उपन्यास वास्तव में एक यात्रा का अनुभव सा कराता है जिसमें आपको भारतीय  नव जागरण का दौर , उपन्यासों की शुरुआत का दौर ,अनुदित उपन्यास, तत्कालीन भारतीय परिवेश , बाल-विवाह जैसी कुरीतियाँ और उनके दुष्परिणाम के दृश्य अनुभूत होंगे | भाषा की वैविध्यता से भरे भारत वर्ष में हिंदी को सम्पूर्ण भारत में स्थापित करने के प्रयास , तत्कालीन लेखकों का अनेक भाषाओँ पर अधिकार एवं भाषा को सिखने की प्रतिबद्धता यहाँ दृष्टिगोचर होती है |  | 

हाँ कुछ प्रश्न फिर अपनी जगह वैसे ही खड़े भी रह जाते  हैं , जिनमे से एक है – महान लेखकों का विरोधाभासी व्यक्तित्व और आचरण | 

हिंदी साहित्य के प्रारंभिक दौर को  लेखों से नहीं बल्कि कहानी के रूप में  अगर पढ़ा जाए तो वो निश्चित ही एक अनूठा व् रोचक अनुभव होगा | लेखिका ने साहित्य से जुडी  उसी कहानी की  यात्रा की ओर अपनी दिशा को साधा है | 


सारिका आशुतोष मूंदडा 

Tuesday, February 9, 2021

जिंदा कहानियां ( शशिकला राय ) पुस्तक विमर्श, संक्षिप्त विचार

 आदरणीया शशिकाला राय द्वारा  लिखित पुस्तक पढ रही थी 

'ज़िन्दा कहानियाँ' ....हाँ ज़िन्दा आज और आने वाले कल की कहानियॉ जो  किसी परी लोक की सैर नहीं करायेगी वरन टटोलेगी हमारी ज़िजीविषा को ,और धिक्कारेगी इसे तुम तकलीफ कहते हो ।

संक्षिप्त मे कहूँ तो इसमे ज़िन्दा दर्दनाक परिस्थितियों से  गुजरते 12 जीते - जागते किरदार हैं ,कुछ नाम है  सिंधु ताई सपकाल ,राजश्री नागरेकर ,सुनीता ताई , नसीमा । इन सब चरित्रों को पढकर ,जानकर  इनके परिवेश  मे झांक कर पता पड़ता है , हमारे भीतर समायी अकूत शक्ति का ,जब खुद का ही जीवन संघर्षों के  दबाव तले सांस लेने को तरस रहा हो तब औरों को जीवन देना... ये अकूत शक्ति ही तो है ,अपनी परिस्थिति के एहसास की उस  नमी ,उस आँच को सहेजना और सोचना कि मै कितनों को इस आग  मे झुलसने से  बचा लूँ , और इस  सब के बीच  लेखिका की लेखनी  पूछती है कुछ सवाल स्वयं  से , इस देश के इज्जतदार  साफ- सुथरे समाज से .....और सच संवेदनाओं ,सहानुभूतियो की चरम  अनुभूति के कृत्य भी आपको लजा  देंगे ,अगर लगता है कि नही... तो पहले  इससे गुजरना  होगा ,देने होंगे उत्तर ..मगर  झुकी होगी पलकें ...धिक्कार रहा होगा मन , टटोलिये कि  कैसा - कैसा हो सकता है जीवन... ? क्या  होती है स्वतंत्रता  या कि अनुमान लगाईये लावनी करती नृत्यांगना के दर्द की भंगिमाओं का.... देखिये कैसी ज़िजीविषा के गर्त से  मेरा भारत पंख फैलाने  की तैयारी  कर रहा है ....

 पैर धंसे है दलदल मे तो क्या ...?

चिन्दि - चिन्दी है वजूद तो क्या ...?

काट दिये हैं पंख मेरे तो क्या ...?

 मै फिर भी उड़ने के स्वप्न देखता  हूँ !


सच वो एक एहसास ही तो है जो सब कुछ है.... जीवन भी और गति भी ......

ज़रूरी है एहसासों मे, 

नमी  और आँच रखना ..

ताकि ख्वाब के बादल ,

साकार करे अस्तित्व अपना 

परखने को अस्तित्व फिर, 

बंजर भूमि पर नजर रखना 

ज़रूरी है एहसासों मे, 

नमी और आँच रखना 


कुछ ऐसी ही हैं ये शख्सियतें ,क्या कर गुजरे उसका भान नही ,मान नही , कितना कुछ बाकी है निगाहें  बस वही पर जाती हैं । धन्यवाद मैम आपको ,ऐसी पुस्तक लिखने के लिए ,जहाँ एक साथ बहुत  कुछ है ...साक्षात्कार, जीवन यात्रा, कहानी ,आपकी विवशता ,कई साहित्यकारों के प्रसंगात्मक संदर्भ ,हमारे राष्ट्र के लिए कई सवाल और साहित्य जगत के लिए खरे  मायनों मे समाज की तस्वीर प्रस्तुत करता एक दस्तावेज ...


सारिका आशुतोष  मूंदड़ा

Saturday, October 24, 2020

दशहरा

 मानव जीवन एक दशहरा, 

छिपा है जैसे भेद सुनहरा 

पंच इन्द्रियां और पंच तत्व 

सकल जीवन के हैं ये 'दशरथ '

समर संपूर्ण जीवन ये चलता ,

'अग्यानी' रावण है पलता,

युक्ति, भक्ति और शक्ति संतुलन, 

फिर निश्चय ही हो 'ग्यान' अवतरण 

आध्यात्म रामायण का ये गहरा 

जो जी ले, हो जाए सुनहरा 

मानव जीवन एक दशहरा 

छिपा कथा में भेद है गहरा.... 

मूल्यांकन

 


त्रेता से  कलि तक आते आते...

सहस्त्रों  फेरे वसुधा ने काटे

बदला काल बदली मानसिकता

स्थितियां पुरातन नए मानदंड 

क्या संभव है .....सम्पूर्ण आंकलन ?

वसुधा भी तो विषधा की संज्ञा हो गयी 

त्रेता से कलि  तक आते आते....

दुष्कृत्य रावण के सराहे  जा रहे,

मर्यादित था रावण ये सोच उपजा रहे,

अक्षम्य कृत्य क्षम्य में परिणीति पा गये

मूल्यांकन पद्धति कितनी  भ्रामक हो गयी !

अतिशोचनीय कलि...... तेरी स्थिति हो गयी

त्रेता से  कलि तक आते  आते....

क्या  दशानन निर्मिति लक्ष्य साधे हैं हम ?

या मन में अब सबके ही कोई रावण ?

कह  मर्यादित उसे स्वयं को हम ,

क्या नहीं चोर बुद्धि सा छलते ? या 

मर्यादित राम स्वनैतिकता से परे

त्रेता  से कलि तक आते आते ....

शोकमग्न थे स्वयं अशोक भी 

धर्म पति का और धर्म राजा का...

व्यथित मनोदशा में भी कैसे ....

सुराज्य की वे नीवें रखते

संतुलन अदम्य वो भूल गए हम ,

त्रेता से कलि तक आते आते....

घाव थे 'सिय'हिय पर माना,

मरहम भी तो सिया का राम बनते

दुश्वार न था पुनर्विवाह उनको,मगर ....

क्यों रच के अश्वमेघ-यज्ञ-भूमिका

वामांगी-पद पर सीता को ही आसीन करते...

त्रेता से कलि तक आते आते ....

भूल  गए इस कथ्य में था क्या ,

था संकेत  मर्यादा का पावित्र्य को,

कि शोभा जीवन-यज्ञ की तुम  ही 

मूल्यांकन  में राम और रावण  के

काश  न भूले  मर्म, काल  

जो थे प्राण रामायण  के....

त्रेता से कलि तक आते आते ....


 सारिका आशुतोष मूंदड़ा