Friday, February 26, 2021

 विधा: फ़िल्म समीक्षा

फ़िल्म : एक रुका हुआ फैंसला


निर्माता ,निर्देशक : बासु चटर्जी 

वर्ष  :1986

संवाद  : रंजीत  कपूर 


कलाकार : दीपक  काजीर  केजरीवाल, अमिताभ  श्रीवास्त्व,    पंकज कपूर, एस . एम . जहीर, सुभाष उदगत, हेमंत मिश्रा, एम .के . रेना, के. के . रेना, अन्नु कपूर, सुब्बिरज ,शेलेन्द्र गोयल ,अजीज कुरेशी  ,सी . डी . सिंधु 


समय : 2:06:09


"एक रुका हुआ फैसला" ,वास्तव मे एक दृष्टि है न्याय को हर कसौटी पर परखने की ,फैसले को रोकने की दृष्टि जब तक कि परिस्थिति के हर पहलू को तौल ना लिया जाए ।

   मूलत : हॉलीवुड फिल्म '12 एंग्री मैन' से  प्रेरित ये फिल्म कई बार मंचित भी हुई है ।फिर बासु चटर्जी ने इस पर फिल्म बनाई। फिल्म की शुरुआत कुछ इस प्रकार होती है ,ज़िसमे जनता मे से 12 लोगों को चुनकर एक ज़िम्मेदारी दी जाती है ,कि  वे पूर्ण मत से एक फैसला करे कि  उन्नीस वर्षीय लड़के ने अपने बाप का कत्ल किया है या नही । इस तरीके  से फैसला लेने का प्रारूप भारतीय न्याय व्यवस्था सम्मत नहीं है ,अत: काल्पनिक है ,मगर फिर भी शुरुआत से ही फिल्म दर्शकों  को बांधने मे पूरी तरह सक्षम है , ज़िज्ञासा बनी रहती है कि  आगे क्या, अब क्या ....?

    ग्यारह सदस्य एकमत से  प्रस्ताव पारित करते हैं बिना समय लिए उसके दोषी होने का ,वहीं एक सदस्य (नंबर 8 , के .के. रेना ) उसे बेकसूरवार कह के सब के गुस्से का तो पात्र बनते ही हैं, और दुविधा ये कि  अपनी बात साबित करने के लिए उनके पास कोई ठोस आधार  भी नही है । बस ये एक कोशिश मात्र है कि  बात की जाए ,विमर्श किया जाए । बाकी सदस्य जहां लड़के की पृष्ठभूमि और गवाहों के आधार पर उसे दोषी साबित करना चाहते हैं ,वहीं नंबर 8 उसकी पृष्ठभूमि को सहानुभूति की नजर से  देखते हैं । निर्णय तब तक नहीं हो सकता ,जब तक सब एकमत ना हों और फिर यही से शुरू होता है तथ्यों के अवलोकन, परिस्थितियों के विश्लेषण का ज़िज्ञासा व कौतूहल पूर्ण सफर ...

     संवाद किसी भी फिल्म मे महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं ,इस फिल्म की तो जान ही संवाद हैं ,क्योंकि पूरा फिल्मांकन केवल एक कमरे मे किया गया है ,कत्ल के समय की परिस्थिति ,घर का दृश्य ,गवाहों की भूमिका, चाकू आदि की स्थिति सब संवादों के सहारे ही एक बिंब बनाते हैं ,बस झलक भर ही गवाहों को दिखाया गया है ।

      संक्षेप मे कहा जाए तो कैसे ' एक रुका हुआ फैंसला' एक फैसले तक आता है ,ये देखना बहुत रोचक है ,किसी की जान से ज्यादा फैसला लेने की जल्दी इसलिये  हो कि  'मशाल' फिल्म देखने जाना है ,या इसलिये कि  वो निम्न तबके का है तो दोषी है ही या कोई ओर उसमे अपने बेटे को देखे ....................तो फिर ये सफर केवल इस केस  का सफर नही रह जाता ,वरन मनोविज्ञान ,संवेदना ,तर्क ,न्याय के प्रति पूर्वाग्रह ,दुरूहता, आपसी वैमनस्य कई रास्तों से गुजरने का सफर बन जाता है ।

      सारे कलाकारों ने बहुत अच्छी अदाकारी की है , विशेष तौर पर पंकज कपूर, के . के . रेना और अन्नु कपूर  ने । हॉ,जिनको गाने बहुत पसंद हैं ,वो मायूस हो सकते हैं क्योंकि इस फिल्म  मे एक भी गाना नही है और  वाकई फिल्म  मे गाने के लिए कोई जगह भी नही है । कुल मिलाकर एक बहुत कसी हुई फिल्म  बासु  चटर्जी ने निर्देशित की है । लीक से हटकर कुछ देखने का शौक जिन्हे है, उनको तो ये बहुत ही पसंद आयेगी, और बाकी दर्शकों के लिए भी निश्चय ही एक अच्छा अनुभव। 


सारिका आशुतोष मूंदड़ा

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