Monday, February 22, 2021

मल्लिका

 

मल्लिका ....मनीषा कुलश्रेष्ठ द्वारा रचित इस उपन्यास के दुसरे संस्करण  में लेखिका ने कहा है कि इसके लिखने के  बाद वो बहुत समय तक कुछ और नहीं लिख पायी , शायद वो 'राईटर्स ब्लाक' की अवस्था में आ गयी थी | उपन्यास को पढकर प्रतीत होता है कि ऐसा होना कोई अचरज की बात भी  नहीं थी | इस उपन्यास को पढ़कर पाठक स्वयं एक अलग परिवेश में पहुँच जाता है | लगभग १६० बरस पीछे ...

उपन्यास जिसके इर्द-गिर्द केन्द्रित है - वो है मल्लिका का  किरदार ,  | मल्लिका का चरित्र वास्तविक है और उनके दूर के भाइयों में बंकिम चन्द्र चटर्जी का नाम भी शामिल है | जिनसे मल्लिका साहित्य के बारे में जानकारी प्राप्त करती रहती हैं , बचपन से ही किताबें पढने की शौक़ीन मल्लिका का गाँव में ये शौक इन्ही चन्द्र भैया के प्रयासों से सफलता प्राप्त करता है | वो एक बाल विधवा हैं | वो बंगाल के मेदिनीपुर के केशोपुर गाँव में कन्या विद्यालय खोलना चाहती हैं , जिसके लिए स्वयं शिक्षा ग्रहण कर रही हैं मल्लिका अपना जीवन गुजारने के नाम पर किसी के भी साथ विवाह नहीं करना चाहती और घर वालों की प्रतिदिन की चर्चा से परेशान हो वो चन्द्र भैया की मदद से काशी आ जाती हैं | काशी में विधवा आश्रम या अकेली विधवा के रहने की कल्पना उस समय भी आसान नहीं थी , लेकिन कुछ जानकारों की मदद से वो ये संभव कर  पायी  | मल्लिका हिंदी सिखने के लिए प्रयासरत थी , उन्हें संस्कृत एवं बांग्ला का ज्ञान भली प्रकार था | ये मल्लिका की किस्मत ही थी कि उनके घर के पास  ही भारतेंदु का घर था – जिन्हें हिंदी साहित्य का पितामह कहा जाता है  | धीरे-धीरे परिचय , फिर हिंदी सिखने का क्रम , फिर काव्य -गोष्ठियों में उनका सम्मिलित होना ...एक ओर है  साहित्यिक यात्रा और और दूसरी ओर है भारतेंदु और मल्लिका का एक दुसरे से बढ़ता जुड़ाव जो कि  भारतेंदु द्वारा संपादित पत्रिकाओं में भी दिखने लगता है -‘हरिश्चन्द्रिका भारतेंदु हरिश्चंद्र का हरीश और मल्लिका का ही दूसरा नाम है चंद्रिका | 

मल्लिका ऐतिहासिक दृष्टि से भी अत्यंत मुख्य पात्र के रूप में उभरता है – जिसने सर्वप्रथम भारतेंदु को अनुवाद विधा से परिचित कराया , उन्होंने बांग्ला से हिंदी में उपन्यास अनुदित किये | लेकिन हिंदी साहित्य में मल्लिका को ये श्रेय मिलना अभी शेष है | इस उपन्यास की लेखिका ने नि:संदेह  उस प्राचीन परिवेश को  पाठक के समक्ष उपस्थित करने में सफलता प्राप्त की है | उस समय की जीवन शैली , बंगाली , ब्रज और तत्कालीन भाषा प्रयोग की झलकियाँ , प्रकाश व्यवस्था के लिए लैंप आदि की व्यवस्था , भारतेंदु के जीवन के विविध आयाम , विधवाओं की स्थिति , हमारे समाज में फैले अंध-विश्वास सब कुछ कथानक में  घुल सा  गया है , अनिर्बान के रूप में उस समय देश की आजादी को अपना लक्ष्य बनाने वाले युवाओं  के जीवन के त्याग  और समर्पण को यहाँ देखा जा सकता है | 

 भारतेंदु और मल्लिका की प्रेम कहानी पर आधारित ये उपन्यास वास्तव में एक यात्रा का अनुभव सा कराता है जिसमें आपको भारतीय  नव जागरण का दौर , उपन्यासों की शुरुआत का दौर ,अनुदित उपन्यास, तत्कालीन भारतीय परिवेश , बाल-विवाह जैसी कुरीतियाँ और उनके दुष्परिणाम के दृश्य अनुभूत होंगे | भाषा की वैविध्यता से भरे भारत वर्ष में हिंदी को सम्पूर्ण भारत में स्थापित करने के प्रयास , तत्कालीन लेखकों का अनेक भाषाओँ पर अधिकार एवं भाषा को सिखने की प्रतिबद्धता यहाँ दृष्टिगोचर होती है |  | 

हाँ कुछ प्रश्न फिर अपनी जगह वैसे ही खड़े भी रह जाते  हैं , जिनमे से एक है – महान लेखकों का विरोधाभासी व्यक्तित्व और आचरण | 

हिंदी साहित्य के प्रारंभिक दौर को  लेखों से नहीं बल्कि कहानी के रूप में  अगर पढ़ा जाए तो वो निश्चित ही एक अनूठा व् रोचक अनुभव होगा | लेखिका ने साहित्य से जुडी  उसी कहानी की  यात्रा की ओर अपनी दिशा को साधा है | 


सारिका आशुतोष मूंदडा 

No comments:

Post a Comment