Saturday, October 24, 2020

दशहरा

 मानव जीवन एक दशहरा, 

छिपा है जैसे भेद सुनहरा 

पंच इन्द्रियां और पंच तत्व 

सकल जीवन के हैं ये 'दशरथ '

समर संपूर्ण जीवन ये चलता ,

'अग्यानी' रावण है पलता,

युक्ति, भक्ति और शक्ति संतुलन, 

फिर निश्चय ही हो 'ग्यान' अवतरण 

आध्यात्म रामायण का ये गहरा 

जो जी ले, हो जाए सुनहरा 

मानव जीवन एक दशहरा 

छिपा कथा में भेद है गहरा.... 

मूल्यांकन

 


त्रेता से  कलि तक आते आते...

सहस्त्रों  फेरे वसुधा ने काटे

बदला काल बदली मानसिकता

स्थितियां पुरातन नए मानदंड 

क्या संभव है .....सम्पूर्ण आंकलन ?

वसुधा भी तो विषधा की संज्ञा हो गयी 

त्रेता से कलि  तक आते आते....

दुष्कृत्य रावण के सराहे  जा रहे,

मर्यादित था रावण ये सोच उपजा रहे,

अक्षम्य कृत्य क्षम्य में परिणीति पा गये

मूल्यांकन पद्धति कितनी  भ्रामक हो गयी !

अतिशोचनीय कलि...... तेरी स्थिति हो गयी

त्रेता से  कलि तक आते  आते....

क्या  दशानन निर्मिति लक्ष्य साधे हैं हम ?

या मन में अब सबके ही कोई रावण ?

कह  मर्यादित उसे स्वयं को हम ,

क्या नहीं चोर बुद्धि सा छलते ? या 

मर्यादित राम स्वनैतिकता से परे

त्रेता  से कलि तक आते आते ....

शोकमग्न थे स्वयं अशोक भी 

धर्म पति का और धर्म राजा का...

व्यथित मनोदशा में भी कैसे ....

सुराज्य की वे नीवें रखते

संतुलन अदम्य वो भूल गए हम ,

त्रेता से कलि तक आते आते....

घाव थे 'सिय'हिय पर माना,

मरहम भी तो सिया का राम बनते

दुश्वार न था पुनर्विवाह उनको,मगर ....

क्यों रच के अश्वमेघ-यज्ञ-भूमिका

वामांगी-पद पर सीता को ही आसीन करते...

त्रेता से कलि तक आते आते ....

भूल  गए इस कथ्य में था क्या ,

था संकेत  मर्यादा का पावित्र्य को,

कि शोभा जीवन-यज्ञ की तुम  ही 

मूल्यांकन  में राम और रावण  के

काश  न भूले  मर्म, काल  

जो थे प्राण रामायण  के....

त्रेता से कलि तक आते आते ....


 सारिका आशुतोष मूंदड़ा

Thursday, October 15, 2020

जो तुम आ जाते एक बार

 महादेवी वर्मा की बहुत खूबसूरत कविता है, इस शीर्षक से....मुझसे बस ऐसे ही कुछ रचित हो गया। कभी - कभी विचार ठहर जाते हैं... आप कुछ लिखना चाहते हैं मगर सब शून्य..... विचारों और कलम की ये शून्यता... दूर हो जाती, जो तुम आ जाते एक बार.. सोचेंगे विचार शून्यता में भी कितना विचार... 🙂🙂

शब्द सारे हुए उपद्रवी 

कलम दिखाए नखरे हजार 

शब्दों को मिलता उल्लास 

जो तुम आ जाते एक बार.... 

अटका हुआ है गीत कोई 

धुन जैसे हो सोई- खोई, 

गान सहज होता साकार 

जो तुम आ जाते एक बार... 



Tuesday, October 13, 2020

रामराज्य

 #रामराज्य का सपना अर्थात एक ऐसे आदर्श की कल्पना , जहाँ हर व्यक्ति के चित्त में मर्यादा का वास हो , स्वआचरण पर पैनी दृष्टि हो , स्वविश्लेष्ण हो | मगर आज हम राम की इसी  भूमि पर राम के आचरण पर प्रश्न खड़ा करते हैं | विशेषकर सीता के परित्याग वाला प्रसंग ..... इसे सम्पूर्ण स्त्री जाति के साथ अन्याय का प्रतीक मान कर तौला जाता है | पता नहीं क्यों मेरे मन में राम के सीता के साथ  व्यवहार को लेकर कभी भी संशयात्मक वृत्ति नहीं रही | जब #आशुतोषराना  जी की किताब #रामराज्य को पढ़ा तो अपने मन के विचारों का दर्पण ही महसूस किया | सीता का परित्याग करते समय राम की विवशता .....उनका अंतर्द्वंद | 

क्यों राम ने मृत्युदंड ना दे दिया धोबी को ? 

क्यों राम सीता के साथ नहीं चले गए ?

राम के ह्रदय में भी ये  विचार आये , मगर उन्होंने वो रास्ता चुना कि सीता की पवित्रता को लेकर उठते प्रश्न सदा  - सदा के लिए समाज में विराम पा गये | 

स्वयं के साथ अन्यायी होकर भी,  सीता को उसके मान के साथ प्रतिष्ठित बनाये रखने वाले राम को समझने के लिए राम की दृष्टि से सोचना होगा | 

वर्तमान परिवेश में जहां तार्किकता और आस्था के द्वन्द विद्यमान है , वहां रामायण को तार्किक शक्ति के साथ , आस्था की धरोहर के रूप में प्रस्तुत करने के लिए, आपको साधुवाद | 

        इस  पुस्तक के सौन्दर्य पक्ष कई है -- प्रत्येक चरित्र का सकारात्मक पक्ष , भाषा सौन्दर्य  , दर्शन शास्त्र , भारतीय संस्कृति के सिद्धांत ...वर्तमान समय के इस संवेदनहीन वातावरण में तो और भी प्रासंगिक |#कैकयी -राम , #सीता- राम , #शूर्पनखा-सीता , #रावण - मंदोदरी , #विभीषण -राम आदि के मध्य संवाद  मंत्रमुग्ध भी करते हैं और चिन्तन की ओर प्रवृत्त भी करते हैं | 

हमारी संस्कृति में शब्दों को  ब्रह्म कहा गया है , क्यों कहते हैं , कितना सही तरीके से इनका प्रयोग करना चाहिए , ये इस उपन्यास की ऐसी निधि है,जिसे पढ़ते समय पाठक अपने ह्रदय में सिर्फ अनुभूत कर सकता है | 

             वे चिंतन पक्ष जो अधिकांशत : विवाद के क्षेत्र में रहते  हैं , उन पर ही यहाँ कलम उकेरी गयी है |

 'कैकयी द्वरा राम को वनवास' इस प्रकरण के आते ही रामायण नया मोड़ तो प्राप्त करती है ही , साथ ही कैकयी का व्यक्तित्व सिर्फ उन दो वचनों में सिमट कर रह जाता है | कैकयी  की एक नयी छवि से मिलना अत्यंत सुखकर होगा |  

राम को ईश्वर , दशरथ- नंदन की छवि में  हमने स्वीकार किया है , मगर राम को विचार के रूप में स्वीकारना अभी शेष है |  राम के विचारों का स्वरूप , जीवन लक्ष्य के प्रति स्पष्टता उनके सम्पूर्ण जीवन में प्रतिबिंबित होते हैं | उन्हीं विचारों का परिचय है -- #कैकयी-राम संवाद | आगे के सारे दृश्य उन विचारों का क्रियान्वयन ... 

सारे प्रसंग अत्यंत सुंदर , जीवन्तता लिए हुए ....सुपर्णा/शूर्पणखा आदि जिन्हें पढकर ही महसूस किया जा सकता है | 

पर  एक अन्य पक्ष जिस पर बात करना चाहूंगी वो है प्राचीन समय का विज्ञान , जिसके लिए सदैव ही ये कहा जाता है , माना जाता है कि वो वर्तमान समय से भी  अधिक उन्नत था|  रामायण में विमान की बात हो  या संजीवनी बूटी का ज्ञान ....इस ओर हमारा ध्यान ले जाते है | #कुम्भकर्ण  के व्यक्तित्व और उसके अंत का चित्रण, में भी विज्ञान के उस रूप के दर्शन  हम कर सकते हैं |

साहित्य का कार्य है - खोते हुए जीवन मूल्यों को बचाने की दिशा में प्रयासरत रहना | जन -जन की आस्था के केन्द्रों पर अगर तर्क, संशय की स्थिति  उत्पन्न करे तो उनके उत्तरों को तर्क से ही दिया जाय , मगर इस सम्पूर्ण प्रक्रिया में ये भी ध्यान रखा जाए कि जो भी रचा जाये , उसमें समाज का उत्थान हो , सकारात्मक दिशा का प्रावधान हो |  इस पुस्तक ने निश्चित रूप से इस कार्य को साकार किया है | 

राम- रावण के मूल्यांकन की बारीकियों को उकेरती इस पुस्तक को पढ़ना अपने भीतर एक #उत्सव को मनाने जैसा है , सही मायनों में #दशहरे का पर्व मनाने जैसा |

Friday, September 25, 2020

 यात्राओं व विद्रोह की अॉच का संगम : लीलाधर जगूडी


"स्वाध्यायस्तप :"
अपनेआप  से सीखना सबसे बड़ी तपस्या है , वही मनुष्य कुछ कर सकता है ,जो जीवन भर विद्यार्थी रहे ,संस्कृताचार्य पाणिनी के इसी आधार वाक्य को अपने जीवन, अपनी काव्य रचनाओं का मूल सिद्धांत मानने वाले लीलाधर जगूडी के जीवन मे विद्रोही प्रवृत्ति ने बड़ी भूमिका निभायी ।
        1 जुलाई 1940 को धंगण गाँव टिहरी ,गढवाल मे पहाडी किसान  परिवार मे भविष्य के साहित्यिक जगत के नवांकुर का प्रादुर्भाव  हुआ। समय ने शायद ऐसा ही सफर चुना था इनके लिए ज़िसमे संघर्षों की यात्रायें थी । पांच वर्ष मे माँ को खोया और फिर पारिवारिक परिस्थितियों व विद्रोही स्वभाववश ग्यारह वर्ष में  आपने घर छोड़ दिया । पहले दिल्ली और फिर राजस्थान पहुँचे । दुर्लभ  शिक्षा के बीज भी साथ साथ मिल रहे थे ,कहने का अर्थ ये कि  मार्गदर्शक तो आपके पास कोई नही था ,स्वयं  अपने अनुभवों से सीखना , ठोकरें खाना ,उठना ,संभलना ये सब केवल दुनिया रूपी पाठशाला ही सीखा सकती है । हाँ जहां तक परम्परागत शिक्षा की बात है तो राजस्थानी मारवाडी  सेठों के प्रति आप बहुत कृतज्ञ हैं क्योंकि उनके द्वारा स्थापित विद्यालयों मे जगूडी जी ने निशुल्क शिक्षा प्राप्त की । संस्कृत का गहन अध्ययन किया। फिर हिन्दी साहित्य में एम. ए .भी किया।  अध्यापक की नौकरी, फिर सेना मे भर्ती होना और फिर सेना से निकलना, कहीं ना कहीं  अस्थिर मन की ओर संकेत करते हैं।  सेना से निकलने का किस्सा भी कम रोचक नहीं है, आपका कोर्ट मार्शल होते- होते बचा, डी .कृष्ण .मेनन जी को आपने एक बेरंग पत्र  लिखा था ,जिसका सारांश था कि साहित्य में  रह के मै देश की ज्यादा  सेवा कर सकता हूँ । मेनन जी के प्रति आप बहुत आभारी हैं। 
           किसी भी  साहित्यकार का साहित्य अलग होता है ,अपने एक विशिष्ट नजरिये या सोच से, इस आलेख मे कोशिश कर रही हूं जगूडी जी के कुछ सिद्धांतों को सम्मुख रखने की क्योंकि इन्हीं  सिद्धांतों ने आपके काव्य को वो दिशा दी है कि पद्म श्री, साहित्य अकादमी जैसे पुरस्कारों से आप सम्मानित हैं। 
       साहित्य सेवा की बात, जो अक्सर सुनायी देती है, उसे नकारते हुए आप कहते हैं कि साहित्य की सेवा नहीं की जा सकती, निर्माण होता है। सेवा तो उसकी की जाती है जो पहले से बना हुआ है, मगर साहित्य निर्माण एक सतत प्रकिया है। 
         नयी कविता व तार सप्तक के प्रमुख हस्ताक्षर इस कवि का वर्तमान रचनाकारों को संदेश  है कि नया समय है, नयी चुनौतियां तो दृष्टि भी नयी चाहिए।  जो रचा जा चुका, अगर वैसा ही सृजन करना है तो नव निर्माण की आवश्यकता ही क्या ? लेखक कभी भी पुराना नहीं होना चाहिए। वर्तमान समय मे यदि हम तुलसी आदि की भाषा मे बात करेंगे तो कितने लोग समझ पायेंगे । साहित्य को अगर साधारण जन तक पहुंचाना है तो उनकी भाषा में ही बात करनी होगी। 
            इलाज तभी होता है जब एक बार 
                   समझ मे आ जाए कि 
                      बीमारी  क्या है 
     मेडिकल कॉलेज की भीड से गुजरते हुए उसे 
          इल्हाम हुआ कि  उसे जो बीमारी है  
उसका  नाम गरीबी है और उसे डॉक्टर नही मिटा सकते ।

अपनी स्वयं की काव्य भाषा के बारे में उनका कहना है  --
     " मै तो सड़कछाप भाषा का प्रयोग करता हूँ ।"

      चीजों के भाव का ,गुंडों के ताव का क्या भरोसा 
              कागज के ताव पर ,नही समाये जो 
                इतनी बड़ी शिकायत लिखाये जो 
        वह भी सोचता है ,कि  गवाह का क्या भरोसा ?
        
आपके लिए कविता मनोरंजन का साधन नहीं वरन समग्र परिदृश्य को चित्रित करने का माध्यम है। चाहे परिवार हो, समाज हो, देश या कि राजनीति, प्रत्येक स्तर पर आपकी पैनी नजर से कुछ नहीं छुपा । आप प्रश्न उठाते हैं, विद्रोह करते हैं क्योंकि आप यथार्थ रचते हैं । विपरीत परिस्थितियों मे भी आशा का दामन नहीं छोड़ते । 

   उदास लोगों  ! यह वज्रपात है 
    इसके बाद तुम्हारे चेहरे पर 
    हिलती हुई इच्छा के अलावा 
     आक्रमण के लिए शेष 
    नही रह जायेगी  दूसरी ज़मीन 

 और कविता एक बयान की तरह है----

मेरी कविता हर उस इनसान का बयान है

जो बंदूकों के गोदाम से अनाज की ख्वाहिश रखता है

मेरी कविता हर उस आँख की दरख्वास्त है

जिसमें आँसू हैं

ये जो हरी घास के टीले हैं

ये जो दरवाजों से सटे हुए हवा के झोंके हैं

ये अब थोड़े दिनों की दास्तान हैं

यहाँ कोई बच्चा

चाहे वह पूरा आदमी ही क्यों न बन जाए

अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो सकेगा

पेट के बल नहीं चल सकेगा

कोहनियों और घुटनों के बल भी नहीं

क्योंकि पहली लड़ाई वाले बच्चे

दुनिया की सबसे आखिरी लड़ाई लड़ने वाले हैं ।

         प्रकृति आपके काव्य मे कोमल रुप मे भी है और जिसे हम असौंदर्य कहते हैं उस रुप में भी  । प्रकृति के बारे में भी वो वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखते हैं और कहते हैं कि प्रकृति भी  राजनीति करती है। 

       नदियाँ कहीं भी नागरिक नहीं होतीं

      और पानी से ज्यादा कठोर और काटनेवाला

       कोई दूसरा औजार नहीं होता

          अनिश्चितता से ही ऱचनात्मकता की शुरुआत होती है, वो संचालित करती हैं । सीधी सपाट राहें आपको नहीं सुहाती, आपको पसंद हैं मोड़....अनिश्चितता ! 
     भले ही आप कहें कि  आपकी भाषा सड़क छाप है ,मगर भाषा  की जो नींव आपके पास है ,मिलना दुर्लभ है । आप ऐसे कवि  हैं जो भाषा के स्तर पर गहन जानकार ,चिंतक व तर्क सम्मत दृष्टि रखते हैं । आपके पास वो उर्वर  ज़मीन है ज़िससे आपने कई भाषाओं को जडों से थामा हुआ है । कई भाषाओं मे आपने अनुवाद के कार्य किये हैं  ।
जीवन का जो बाह्य स्वरूप  या परिस्थितियां आपके  सम्मुख आयी ,आपने उन्हे  जीया, चिंतन किया और  अपने साहित्य  मे रच दिया ।अपने  अंतरमन को मथ के जो लेखनी  से  उकेरा ,वो व्यापक फलक पर आच्छादित है ,जिसमे शहर का परेशान जीवन भी है तो गाँव की चिंता भी है , इस परिवेश को स्वीकार ना करके आप विद्रोह के लिए ललकारते हैं , स्वाभिमानी  बनने के लिए आवहान करते हैं ...
   उनकी पाखंडी  संगीनें छीनो 
     और दोनों पर निकालकर 
   उनकी घमंडी  आँखों का पानी 
      चिडियों को पिला दो 
क्योंकि एक मामूली चिडिया  को भी 
   हमें अब स्वाभिमानी बनाना है ।
  
आपका  काव्य अराजकता व बडबोलेपन का काव्य नहीं है ,वरन यथार्थ की सापेक्ष संरचना का दर्शन उसमें विद्यमान है। 

कविता संग्रह: 
शंखमुखी शिखरों पर, नाटक जारी है, इस यात्रा में, रात अब भी मौजूद है, बची हुई पृथ्वी, घबराए हुए शब्द, भय भी शक्ति देता है, अनुभव के आकाश में चाँद, महाकाव्य के बिना, ईश्वर की अध्यक्षता में, खबर का मुँह विज्ञापन से ढँका है
नाटक: पाँच बेटे
गद्य: मेरे साक्षात्कार

लीलाधर जगूड़ी को हिंदी साहित्य हेतु विभिन्न पुरस्कारों व सम्मानों से नवाजा गया है, जिनमें प्रमुख हैं:

साहित्य अकादमी पुरस्कार
पद्मश्री सम्मान
रघुवीर सहाय सम्मान
भारतीय भाषा परिषद् शतदल सम्मान
नमित पुरस्कार
आकाशवाणी पुरस्कार