यात्राओं व विद्रोह की अॉच का संगम : लीलाधर जगूडी
"स्वाध्यायस्तप :"
अपनेआप से सीखना सबसे बड़ी तपस्या है , वही मनुष्य कुछ कर सकता है ,जो जीवन भर विद्यार्थी रहे ,संस्कृताचार्य पाणिनी के इसी आधार वाक्य को अपने जीवन, अपनी काव्य रचनाओं का मूल सिद्धांत मानने वाले लीलाधर जगूडी के जीवन मे विद्रोही प्रवृत्ति ने बड़ी भूमिका निभायी ।
1 जुलाई 1940 को धंगण गाँव टिहरी ,गढवाल मे पहाडी किसान परिवार मे भविष्य के साहित्यिक जगत के नवांकुर का प्रादुर्भाव हुआ। समय ने शायद ऐसा ही सफर चुना था इनके लिए ज़िसमे संघर्षों की यात्रायें थी । पांच वर्ष मे माँ को खोया और फिर पारिवारिक परिस्थितियों व विद्रोही स्वभाववश ग्यारह वर्ष में आपने घर छोड़ दिया । पहले दिल्ली और फिर राजस्थान पहुँचे । दुर्लभ शिक्षा के बीज भी साथ साथ मिल रहे थे ,कहने का अर्थ ये कि मार्गदर्शक तो आपके पास कोई नही था ,स्वयं अपने अनुभवों से सीखना , ठोकरें खाना ,उठना ,संभलना ये सब केवल दुनिया रूपी पाठशाला ही सीखा सकती है । हाँ जहां तक परम्परागत शिक्षा की बात है तो राजस्थानी मारवाडी सेठों के प्रति आप बहुत कृतज्ञ हैं क्योंकि उनके द्वारा स्थापित विद्यालयों मे जगूडी जी ने निशुल्क शिक्षा प्राप्त की । संस्कृत का गहन अध्ययन किया। फिर हिन्दी साहित्य में एम. ए .भी किया। अध्यापक की नौकरी, फिर सेना मे भर्ती होना और फिर सेना से निकलना, कहीं ना कहीं अस्थिर मन की ओर संकेत करते हैं। सेना से निकलने का किस्सा भी कम रोचक नहीं है, आपका कोर्ट मार्शल होते- होते बचा, डी .कृष्ण .मेनन जी को आपने एक बेरंग पत्र लिखा था ,जिसका सारांश था कि साहित्य में रह के मै देश की ज्यादा सेवा कर सकता हूँ । मेनन जी के प्रति आप बहुत आभारी हैं।
किसी भी साहित्यकार का साहित्य अलग होता है ,अपने एक विशिष्ट नजरिये या सोच से, इस आलेख मे कोशिश कर रही हूं जगूडी जी के कुछ सिद्धांतों को सम्मुख रखने की क्योंकि इन्हीं सिद्धांतों ने आपके काव्य को वो दिशा दी है कि पद्म श्री, साहित्य अकादमी जैसे पुरस्कारों से आप सम्मानित हैं।
साहित्य सेवा की बात, जो अक्सर सुनायी देती है, उसे नकारते हुए आप कहते हैं कि साहित्य की सेवा नहीं की जा सकती, निर्माण होता है। सेवा तो उसकी की जाती है जो पहले से बना हुआ है, मगर साहित्य निर्माण एक सतत प्रकिया है।
नयी कविता व तार सप्तक के प्रमुख हस्ताक्षर इस कवि का वर्तमान रचनाकारों को संदेश है कि नया समय है, नयी चुनौतियां तो दृष्टि भी नयी चाहिए। जो रचा जा चुका, अगर वैसा ही सृजन करना है तो नव निर्माण की आवश्यकता ही क्या ? लेखक कभी भी पुराना नहीं होना चाहिए। वर्तमान समय मे यदि हम तुलसी आदि की भाषा मे बात करेंगे तो कितने लोग समझ पायेंगे । साहित्य को अगर साधारण जन तक पहुंचाना है तो उनकी भाषा में ही बात करनी होगी।
इलाज तभी होता है जब एक बार
समझ मे आ जाए कि
बीमारी क्या है
मेडिकल कॉलेज की भीड से गुजरते हुए उसे
इल्हाम हुआ कि उसे जो बीमारी है
उसका नाम गरीबी है और उसे डॉक्टर नही मिटा सकते ।
अपनी स्वयं की काव्य भाषा के बारे में उनका कहना है --
" मै तो सड़कछाप भाषा का प्रयोग करता हूँ ।"
चीजों के भाव का ,गुंडों के ताव का क्या भरोसा
कागज के ताव पर ,नही समाये जो
इतनी बड़ी शिकायत लिखाये जो
वह भी सोचता है ,कि गवाह का क्या भरोसा ?
आपके लिए कविता मनोरंजन का साधन नहीं वरन समग्र परिदृश्य को चित्रित करने का माध्यम है। चाहे परिवार हो, समाज हो, देश या कि राजनीति, प्रत्येक स्तर पर आपकी पैनी नजर से कुछ नहीं छुपा । आप प्रश्न उठाते हैं, विद्रोह करते हैं क्योंकि आप यथार्थ रचते हैं । विपरीत परिस्थितियों मे भी आशा का दामन नहीं छोड़ते ।
उदास लोगों ! यह वज्रपात है
इसके बाद तुम्हारे चेहरे पर
हिलती हुई इच्छा के अलावा
आक्रमण के लिए शेष
नही रह जायेगी दूसरी ज़मीन
और कविता एक बयान की तरह है----
मेरी कविता हर उस इनसान का बयान है
जो बंदूकों के गोदाम से अनाज की ख्वाहिश रखता है
मेरी कविता हर उस आँख की दरख्वास्त है
जिसमें आँसू हैं
ये जो हरी घास के टीले हैं
ये जो दरवाजों से सटे हुए हवा के झोंके हैं
ये अब थोड़े दिनों की दास्तान हैं
यहाँ कोई बच्चा
चाहे वह पूरा आदमी ही क्यों न बन जाए
अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो सकेगा
पेट के बल नहीं चल सकेगा
कोहनियों और घुटनों के बल भी नहीं
क्योंकि पहली लड़ाई वाले बच्चे
दुनिया की सबसे आखिरी लड़ाई लड़ने वाले हैं ।
प्रकृति आपके काव्य मे कोमल रुप मे भी है और जिसे हम असौंदर्य कहते हैं उस रुप में भी । प्रकृति के बारे में भी वो वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखते हैं और कहते हैं कि प्रकृति भी राजनीति करती है।
नदियाँ कहीं भी नागरिक नहीं होतीं
और पानी से ज्यादा कठोर और काटनेवाला
कोई दूसरा औजार नहीं होता
अनिश्चितता से ही ऱचनात्मकता की शुरुआत होती है, वो संचालित करती हैं । सीधी सपाट राहें आपको नहीं सुहाती, आपको पसंद हैं मोड़....अनिश्चितता !
भले ही आप कहें कि आपकी भाषा सड़क छाप है ,मगर भाषा की जो नींव आपके पास है ,मिलना दुर्लभ है । आप ऐसे कवि हैं जो भाषा के स्तर पर गहन जानकार ,चिंतक व तर्क सम्मत दृष्टि रखते हैं । आपके पास वो उर्वर ज़मीन है ज़िससे आपने कई भाषाओं को जडों से थामा हुआ है । कई भाषाओं मे आपने अनुवाद के कार्य किये हैं ।
जीवन का जो बाह्य स्वरूप या परिस्थितियां आपके सम्मुख आयी ,आपने उन्हे जीया, चिंतन किया और अपने साहित्य मे रच दिया ।अपने अंतरमन को मथ के जो लेखनी से उकेरा ,वो व्यापक फलक पर आच्छादित है ,जिसमे शहर का परेशान जीवन भी है तो गाँव की चिंता भी है , इस परिवेश को स्वीकार ना करके आप विद्रोह के लिए ललकारते हैं , स्वाभिमानी बनने के लिए आवहान करते हैं ...
उनकी पाखंडी संगीनें छीनो
और दोनों पर निकालकर
उनकी घमंडी आँखों का पानी
चिडियों को पिला दो
क्योंकि एक मामूली चिडिया को भी
हमें अब स्वाभिमानी बनाना है ।
आपका काव्य अराजकता व बडबोलेपन का काव्य नहीं है ,वरन यथार्थ की सापेक्ष संरचना का दर्शन उसमें विद्यमान है।
कविता संग्रह:
शंखमुखी शिखरों पर, नाटक जारी है, इस यात्रा में, रात अब भी मौजूद है, बची हुई पृथ्वी, घबराए हुए शब्द, भय भी शक्ति देता है, अनुभव के आकाश में चाँद, महाकाव्य के बिना, ईश्वर की अध्यक्षता में, खबर का मुँह विज्ञापन से ढँका है
नाटक: पाँच बेटे
गद्य: मेरे साक्षात्कार
लीलाधर जगूड़ी को हिंदी साहित्य हेतु विभिन्न पुरस्कारों व सम्मानों से नवाजा गया है, जिनमें प्रमुख हैं:
साहित्य अकादमी पुरस्कार
पद्मश्री सम्मान
रघुवीर सहाय सम्मान
भारतीय भाषा परिषद् शतदल सम्मान
नमित पुरस्कार
आकाशवाणी पुरस्कार