त्रेता से कलि तक आते आते...
सहस्त्रों फेरे वसुधा ने काटे
बदला काल बदली मानसिकता
स्थितियां पुरातन नए मानदंड
क्या संभव है .....सम्पूर्ण आंकलन ?
वसुधा भी तो विषधा की संज्ञा हो गयी
त्रेता से कलि तक आते आते....
दुष्कृत्य रावण के सराहे जा रहे,
मर्यादित था रावण ये सोच उपजा रहे,
अक्षम्य कृत्य क्षम्य में परिणीति पा गये
मूल्यांकन पद्धति कितनी भ्रामक हो गयी !
अतिशोचनीय कलि...... तेरी स्थिति हो गयी
त्रेता से कलि तक आते आते....
क्या दशानन निर्मिति लक्ष्य साधे हैं हम ?
या मन में अब सबके ही कोई रावण ?
कह मर्यादित उसे स्वयं को हम ,
क्या नहीं चोर बुद्धि सा छलते ? या
मर्यादित राम स्वनैतिकता से परे
त्रेता से कलि तक आते आते ....
शोकमग्न थे स्वयं अशोक भी
धर्म पति का और धर्म राजा का...
व्यथित मनोदशा में भी कैसे ....
सुराज्य की वे नीवें रखते
संतुलन अदम्य वो भूल गए हम ,
त्रेता से कलि तक आते आते....
घाव थे 'सिय'हिय पर माना,
मरहम भी तो सिया का राम बनते
दुश्वार न था पुनर्विवाह उनको,मगर ....
क्यों रच के अश्वमेघ-यज्ञ-भूमिका
वामांगी-पद पर सीता को ही आसीन करते...
त्रेता से कलि तक आते आते ....
भूल गए इस कथ्य में था क्या ,
था संकेत मर्यादा का पावित्र्य को,
कि शोभा जीवन-यज्ञ की तुम ही
मूल्यांकन में राम और रावण के
काश न भूले मर्म, काल
जो थे प्राण रामायण के....
त्रेता से कलि तक आते आते ....
सारिका आशुतोष मूंदड़ा
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