अगर कुछ मीठा पढने का मन हो तो पढ़िये मायामृग जी का
' मुझमे मीठा तू है ' , 77 कविताओं का खूबसूरत काव्य संग्रह वाकई बहुत मीठा है । कृतज्ञता, दार्शनिकता के भावों के रस से अंतरमन सिक्त हो जायेगा । वर्तमान समय मे कृतज्ञता के उदगार विलुप्त प्राय: हो चले हैं । प्रत्येक परिस्थिति के लिए समाज दोषी है , तो रोष ही रोष है ...अगर ऐसे समय मे अपने परिवेश , प्रकृति रूपी ईश्वर के प्रति उपकृत दृष्टि से सराबोर पुस्तक पढने को मिले तो जिस आनन्द का अनुभव हो तो उसका तो कहना ही क्या ...
कई वर्षों पूर्व अज्ञेय ने स्व अस्तित्ववाद को वाणी प्रदान की और उसके महत्व को प्रतिपादित किया था ...क्या अस्तित्व की बात सिर्फ अधिकारों के लिए है , क्या कर्तव्य का बोध हम विस्मृत कर चुके हैं , अगर नहीं तो क्या हमने कभी टटोला स्वयं को ....
एक बार झांक लो भीतर
तुम्हारे पास नहीं है इस कमरे की चाबी
कोई जवाब आये तो भीतर से सुनना
कभी सोचा इस प्रकृति को, इसके प्रति अपने कृतघ्नता पूर्ण व्यवहार को ....क्या कभी क्षमा मांगी ? तो मांगिये कवि के साथ क्योंकि क्षमा मांगना राहत देगा । वही चिर-परिचित उपमान मगर अर्थ का एक नया विस्तार ...ऐसा प्रतीत होता है वक्त की सीढियां चढ कर अब व्यक्ति फुरसत से नाप रहा है अपना हर कदम,अपनी हर सोच ...तभी तो कभी कह उठते हैं 'क्षमाप्रार्थी हूँ मैं " और कभी खंगालते हैं अपने बड़े होने के दम्भ को ....कविता 'मैं बड़ा ' में तो अहम की पीडा से त्रस्त मानसिकता वाले व्यक्तियों के लिए मानो चिंतन युक्त औषधि ही दे दी है ...
मुझसे तो बड़े हैं पेड़
मै तप जाता हूँ ज़रा सी आँच मे
उनमें बढती जाती है छांव धूप के तेज होने के साथ
भीतर गहरी ठंडक होती तो हो सकता था छांव भर जीना
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बड़ा होने के लिए होना होता है ....पेड़,
आसमान ....धरती और नदी ...
कोई भी लेखन तभी सार्थक होता है जब पाठक उससे जुड सके और इस काव्य संग्रह मे कितनी ही बार ये प्रतीत होता है कि स्व मल्यांकन करने जो व्यक्ति बैठा है वो हम स्वयम् हैं , एक सुनी हुई मगर उपेक्षित भाषा की ओर आप ध्यान खींचते हैं और शब्दावली तो बहुत ही सहज....मगर कब प्रकृति की भाषा आशीष देती हुई और राह सम्मुख रखते हुए गंभीर अर्थ धरने लगती है ,भान नहीं होता ।
भाषा हमेशा सुनी और पढ़ी नहीं जाती
छू कर कहा ,उस छोटे पौधे ने
यह स्पर्श याद रखना ..हरे रहना सदा
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हर सहमति एक संभावना है
संभावना से भरी है धरती की भाषा
झुककर छूने से समझ आती है .....
सीमाओं मे बांधना या बंधना अक्सर नकारात्मक प्रतीत होता है ,मगर मनुष्य की सीमायें याद दिलाती एक कविता की पंक्तियां सकारात्मकता की ओर ले जाती हैं । अपनी सीमाओं, हदों को पहचान कर जो परिधि निर्मित होती है ,वो हमें असीम का दर्शन करने के लिए दृष्टि प्रदान करती है ।
आसमान भर फैला था मेरा गर्व ऊँचाईयों को छूने का
मैने खंगाले सभी मुहावरे
ज़िनमे आसमान से ऊँचा होने का अर्थ था
पर आँख की हद से आगे नहीं जा सकता मेरा आकाश ...
सारिका आशुतोष मूंदड़ा