Friday, February 28, 2014

आस का झरना

















तिमिर युक्त मन में,
आस की लौ जलाते हो तुम
विशवास पकड़ हमारा,
उस राह ले जाते हो तुम
पतझड़ में उजड़े वृक्ष पर,
हरियाली का झुरमुट लगते हो तुम
कहती है 'अनुभूति',
स्नेह का झरना,ऐ मेरे मालिक
सहज,अविरल,सर्वदा
हम तक पहुंचाने को 'आतुर' हो तुम

सारिका आशुतोष मूंदड़ा

Thursday, February 27, 2014

दर्द गुनगुनाइए..........













         गुनगुनाना है तो दर्द को भी गुनगुनाइए
भीतर जो है सुषुप्त सी ............. उस गजल को जगाइए
       पथ काँटों का है तो भी चलते जाइये
सुर्ख रंग की लालिमा से.............गुलाब कोई खिलाइये
        तपिश आती है मिटाने  वजूद अक्सर
पिघलते वक़्त भी............हो सके  कोई चिराग जलाइए
           
                 सारिका आशुतोष मूंदड़ा 

Wednesday, February 26, 2014

जिंदगी.......

हर लम्हे के साथ,
सपनों की मुट्ठी से 
फिसल रही है जिंदगी.......
हर शख्स बैठा है,
कुछ अधूरे सपनों, 
कुछ हकीकतों के ढेर पर,
सोचता है फिर भी,
आशाओं की मरीचिका में,
कभी तो मुकम्मल रूप,
आखिर लेगी जिंदगी...........
भूल जाता है अक्सर,
मुकम्मल मिलती नहीं कभी ये,
मुकम्मल बनानी पड़ती है जिंदगी..........
सारिका आशुतोष मूंदड़ा

Tuesday, February 25, 2014

कैसे विहंग है............

                                                                                                     

                                            आ ही जाते हैं ,
                                                 चाहे-अनचाहे .........
                                                      कितना शोर किया करते हैं
                                             मुक्त करने की,
                                                  कोशिश में.............
                                                      और जकड़ा करते हैं
                                             कैसे विहंग है,
                                                   जो बंधन में.............
                                                        सुख समझा करते हैं
                                             यादों के पखेरू
                                                    अक्सर उड़ान 
                                                        मेरे इर्द-गिर्द भरा करते हैं
                                                 
                                                          सारिका आशुतोष मूंदड़ा

Wednesday, February 19, 2014

क्या ये धर्म है ?


फिर कहीं,
आग लगी है मानवता को,
फिर धर्म,
घी बनकर सुलग रहा है
फिर से, 
मजहब के नाम पर
झुलस गयी,
रूह एक मासूम कली की
वो मासूम,
जिसे धर्म क्या है ?नहीं पता है
आखिर किसने,
पशुता को धर्म कहा है?

सारिका आशुतोष मूंदड़ा

Thursday, February 6, 2014

कशमकश

आज फिर से वही प्रश्न सुमन के मस्तिष्क में उठ रहा था कि क्यों?बेटियां ही क्यों?ऐसा नहीं कि ये प्रश्न पहले नहीं उठे कभी या उसने पूछे नहीं.पूछे थे ,कई बार पूछे थे,जवाब भी मिलते थे,पर कोई भी जवाब उसे संतुष्ट नहीं कर पाया था.पर आज ,आज जवाब जानने कि तीव्र उत्कंठा थी उसके मन के भीतर ,जैसे सवालों की नदी बह रही हो किसी समंदर में मिलने के लिए ,पर अपना समंदर उसे खुद ही ढूँढना होगा
                              ऐसी हलचल सी क्यों थी उसके हृदय में?एक वेदना थी उसके दिल में जो जवाब ढूंढ़ ही लेती है. आज... ,आज उसे भी अपने ही घर को पराया सुनने का गरम शीशा अपने कान में डालना था.कैसे मान ले कोई भी बेटी कि  जो घर उसकी  आवाज की खनक के बिना सुनसान होता है आज वो खनक परायी हो गयी,क्योंकि दुनिया की रीत है और इसलिए बनी कि नारी का वजूद पुरुष के समक्ष उन्नीस है इसलिए इस त्याग की अपेक्षा नारी से ही की जाती है.पर आज के जमाने की नारी को ऐसे जवाबों से कहाँ संतुष्टि मिल सकती थी
           एक अजीब सी मनोदशा है सुमन कि कुछ सपने आने वाले जीवन के और कुछ यादों का सफ़र जो तय किया था उसे पीछे छोड़ना और इस  परिवर्तन में मुस्कान को संजोकरनए सांचे में खुद को ढालना था और न केवल ढलना बल्कि ढलते वक़्त होने वाले बदलाव में ,अपने परिवार का मान संजोना.क्या इतनी सामर्थ्य किसी पुरुष में है कि किसी के लिए अपने जीवन को बदल ले,और कुछ इस तरह बदल ले कि पुराने सांचे का मान रह जाए और ये अपेक्षा हर बेटी से  की  जाती है क्योंकि मिटटी बदलेगी तो बदलाव तो आयेंगे ही.पुरुष और नारी में इतना सामर्थ्यवान कौन है ?ये शक्ति तो नारी का सहज गुण है जो प्रकृति प्रदत्त हैऔर जब भी वो खुद का पुनर्जन्म करती है ये दुनिया नारी को उन्नीस कह के या कमतर कह के न केवल  उसकी शक्ति को अनदेखा करती है वरन पुरुष प्रधानता सिद्ध करती है  क्या किसी पुरुष के लिए ये कार्य इतना सहज होगा,जितनी सहजता से ये उत्तरदायित्व बेटियाँ निभा पाती है?नहीं शायद  कभी नहीं..............स्वतः ही सुमन का सर न के लिए हिल गया था और इस विचार मंथन में अनायास ही उसने समंदर ढूंढ़ लिया था.अपने आंसुओं की नदी में निहित ऊर्जा को उसने पा लिया था जैसे किसी मृग को कस्तूरी की तलाश हो और उसे वो मिल जाए .
आज उसकी माँ की आँखों में हैरानी थी की आज उसने क्यों नहीं पूछा कि क्यों ?आखिर क्यों बेटियां विदा होती आयी है संसार में?माँ की इस बैचनी से कैसे अनभिज्ञ रह पाती बेटी, उसने खुद ही कहा ............
एक पग आगे बुलाता है,
एक पग पीछे खींचता है
विदाई का ये पल, 
ऐसा क्यों होता है?
जिस ख़ुशी का पता नहीं 
उसके लिए,जो है..................
उसे क्यों खोना पड़ता है
क्यों अपनों से दूर ,
बेटियों को होना पड़ता है?
आँखों में सपने भी होते हैं,
और आंसुओं की नदी भी,
इस नदी को छुपाना होता है
सपनो के बहाव में.........
ऐसा कर पाना होता है.............
बस बेटी के स्वभाव में
इसीलिए ना माँ ,इसीलिए बेटियां 
विदा होती आयी हैं संसार मे

सारिका आशुतोष मूंदड़ा