तिमिर युक्त मन में,
आस की लौ जलाते हो तुम
विशवास पकड़ हमारा,
उस राह ले जाते हो तुम
पतझड़ में उजड़े वृक्ष पर,
हरियाली का झुरमुट लगते हो तुम
कहती है 'अनुभूति',
स्नेह का झरना,ऐ मेरे मालिक
सहज,अविरल,सर्वदा
हम तक पहुंचाने को 'आतुर' हो तुम
सारिका आशुतोष मूंदड़ा
क्या बात है
ReplyDeleteक्या बात है
ReplyDeleteसुंदर
ReplyDeleteलग रहा है पंत को पढ़ रही हूं