Friday, February 28, 2014

आस का झरना

















तिमिर युक्त मन में,
आस की लौ जलाते हो तुम
विशवास पकड़ हमारा,
उस राह ले जाते हो तुम
पतझड़ में उजड़े वृक्ष पर,
हरियाली का झुरमुट लगते हो तुम
कहती है 'अनुभूति',
स्नेह का झरना,ऐ मेरे मालिक
सहज,अविरल,सर्वदा
हम तक पहुंचाने को 'आतुर' हो तुम

सारिका आशुतोष मूंदड़ा

3 comments:

  1. सुंदर
    लग रहा है पंत को पढ़ रही हूं

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