Tuesday, November 26, 2013

जिंदगी

ना जाने कितना कुछ लिखा गया,
ना जाने कितना कुछ सुना गया,
मगर ऐ जिंदगी तेरा प्याला,
खाली ही रह गया
संजोती रही तू सबके मर्म को,
जैसे प्याला तेरा अंतहीन -गर्त हुआ
हमेशा खाली ही रह गया
हमेशा खाली ही...........
सारिका आशुतोष मूंदड़ा

Wednesday, November 13, 2013

बचपन


जिंदगी के सफ़र में चाहे दूर कोई,
कितना ही निकल जाए,
सुनाये जाते हैं तेरे किस्से कुछ यूँ
जैसे तू वहीँ पर ठहरा है
कुछ ऐसी कशिश सी है तुझमे,
तू हर दिल में बसता है
गुजर जाने के बाद भी यादों में,
सूरज सा खिल के रहता है
 सारिका आशुतोष मूंदड़ा

Saturday, August 24, 2013

कृष्णा



















ना दिल कुछ सुनता है ना सुनाता है आजकल ,
तटस्थ हो जाए कृष्णा तेरी, भक्ति में मस्त होकर
बस इसी  रंग की ललक,करता रहता है आजकल
सारिका आशुतोष मूंदडा

Wednesday, August 7, 2013

लोग कहते हैं की मन की गति बड़ी तेज होती है,जाने कितनी दूरियां पल भर में तय करने की सामर्थ्य है इसमें,फिर चाहे बात चाँद सितारों की हो या किसी के मन के भावों को बिना बोले पढ़ लेने की और कमाल की बात है ये खासियत सबके पास है............विरोधाभासी दिशाओं में भी ऐसे विचरण कर लेता है कि लगता नहीं कि एक ही है ये .कभी ऐसा प्रतीत होता है ना  कि मानो 'ईश्वर' ने मन रूपी अवतार लिया हो,तभी तो एक साथ इतनी जगह हो सकता है,नहीं तो किसी लौकिक शक्ति की क्या सामर्थ्य .........तो  क्या  मन  अलौकिक  है ?या  ये कहा जाए ईश्वर ने अपना दिव्यांश दिया है मन के रूप में,और कोशिश छोड़ दी गयी हम पर उसे अंश से पूर्णता देने की.
सारिका आशुतोष मूंदड़ा

Tuesday, March 5, 2013

कृष्ण














हे भक्त-वत्सल,हे कृष्णा
ओ मेरे बंधू,मेरे सखा,
प्रतिदिन ध्यान धर सकूं तुम्हारा,
इतना सौभाग्य दे दो तुम.
इस माया-जाल मैं देख सकूं तुमको,
दे दो ऐसी दृष्टि तुम
निष्कपट कर दो ह्रदय को,
बस जाओ मेरी भावना मैं तुम
कर्म,सत्कर्म बन जाए प्रभु,
हाथ पकड़ लो आकर तुम
महसूस करूँ तुम्हे मैं चहुँ ओर,
बन जाओ मेरी अनभूति तुम
अनेक विकार जकड़े हैं मुझको,
मुक्त कर अपना कैदी कर लो तुम
ओर क्या कहूं तुमसे करुणा-निधान
बन जाओ मेरी परछाई तुम



इन्द्रधनुषी रंगों से सुंदर ये जीवन