कहानी - विश्वास के अदृश्य पंख ( अभिनव इमरोज में प्रकाशित )
भोर ? ये भोर ही है ना एक-एक कदम जो भोर आगे की ओर बढ़ा रही थी,एक बार तो निशि अवाक सी उसे देखती रह गयी ,अपनी आँखों पर उसे विश्वास ही नहीं हो पा रहा था अभी कुछ महीनों से ही तो भोर को देखने का लगातार चलता सिलसिला थमा था आज भी जो मिलना हुआ था तो छुट्टी के कारण डॉ. ने जो अलग समय दिया था उसकी बदौलत ,और निशि जो देख रही थी ,यकीं नहीं कर पा रही थी ,मगर मन से एक आवाज मानो बार बार पूछ रही थी कि क्यों,क्यों नहीं हो सकता निशि ?तुमने तो स्वयं देखा है ,हर्षिता को पल पल भोर के प्रति समर्पित,कोशिश करते हुए ,फिर क्यों नहीं ? तुम्हे चमत्कार लग रहा है न ? कह लो ,अक्सर ऐसा ही तो कहते हैं सब ,कोई कोई ही समझ पाता है कि करिश्मे यूँ ही नहीं हो जाते रोजाना किये गए प्रयास ही किसी करिश्मे का आकार ग्रहण करते हैं अब उसके अंतर्मन में अपनेआप ही मंथन होने लगा था
किसी चलचित्र की भाँति घूम गए बीते चार साल,जब हर्षिता से वो पहली बार मिली थी यहीं इसी जगह पर इसी जगह माने स्पीच थेरेपिस्ट के यहां ,जहाँ बच्चे बोलने जैसी साधारण प्रक्रिया के लिए जूझते हैं ,उसकी बेटी को भी तो वक्त ने इस सफर के लिए चुना था ,जब और बच्चे मजे से खेलते हैं बोलते हैं और इन बच्चों को नियम से डॉ.के पास जाना होता है ,एक्सरसाइज करवानी होती है ताकि ये भी इन
शब्दों की भाषा बोल सकें और इस आने जाने में होने वाली थकान के बाद पढ़ना या खेलना सब कुछ बड़ा बोझिल सा हो जाता है ,सहज सी दिखने वाकई प्रक्रियाएं अगर असहज हो जाएँ तो कितनी तकलीफ होती है क्या अजब कि यहाँ पर हर माँ के चेहरे पर परेशानी दिखे मगर हर्षिता को इन सालों में बिलकुल अपने नाम के अनुरूप ही पाया था ,हर्ष से परिपूर्ण,बाहरी परिस्थितियां जिसे चुरा नहीं सकती ,यहीं पर उससे जो पहली झलक मिली थी ,आज भी ज्यों कि त्यों मानस पटल पर अंकित हैं | चेहरे पर सौम्य भाव,शांति और किताब पढ़ने में व्यस्त ,किताब भी कोई कहानी,उन्यास आदि नहीं,बच्चों के विकास और मनोवैज्ञानिकता से सम्बंधित वहां और भी लोग थे ,मगर सबके चेहरे और बातों से सिर्फ परेशानी और निराशा के रंग बिखर रहे थे और ये सबसे अनभिज्ञ अपनी दुनिया में खोयी सी ,ये इतनी अलग कैसे,ये तो तब भी सोचा था न मैंने और स्वयं को एक आश्वासित करता सा उत्तर भी दे डाला था कम परेशानी होगी इनके बच्चे को पर इसका उत्तर बहुत शीघ्र ही मेरे सम्मुख आने वाला था | स्पीच थेरेपी के बारे में ज्यादा जानकारी मुझे थी नहीं ,तो मै सबसे बात करके अपने भीतर की माँ को शायद आश्वस्त कर रही थी जानकारी सहेज कर --आप कब से आ रहे हैं? क्या प्रॉब्लम है? फर्क है या नहीं ? आदि आदि अपने इसी क्रम को आगे बढाते हुए मैं ही हर्षिता की ओर उन्मुख थी
हेल्लो मेरा नाम निशी है
हाय मेरा नाम हर्षिता
आप यहाँ किसी के ट्रीटमेंट के लिये. ..
हाँ ,मेरी बेटी भोर
क्या प्रॉब्लम है उसे ,कब से आ रही हैं ,फर्क है ..?
मैं तीन साल से आ रही हूँ , उसकी बॉडी लो टोन है
मेरे चेहरे पर नासमझी के भाव देख कर फिर वो बोली लो टोन मतलब की वो खाना चबा नही सकती,उसे लिक्विड फॉर्म में देना होता है उसकी बॉडी में ताकत नहीं है ,अभी कुछ दिनों से सेमी सॉलिड फूड शुरु किया है ,कुछ शब्द बोल रही है अब (चेहरे पर मुस्कान लिए वो बोली )
फर्क है, थोड़ा वक्त और लगेगा (आश्वस्त भाव उनके चेहरे पर था)
ओ.के.
उन्होंने जो बताया उसे सुन कर मेरी सोच में यही आया कि तीन सालों से आप आ रही हैं और कितना वक्त ...?
मगर उनके शब्दों और चेहरे पर जो आशा थी उसने मेरी प्रश्नवाचक मुद्रा को परे कर दिया | उनहोने फिर मेरी परी के बारे में पुछा | फिर वो किताब पढने में और मैं सालों लम्बी थेरपी के विचारों में गुम हो गए |
ईश्वर कभी कभी बहुत जल्दी उत्तर देता है मैने जो ये सोचा था कि इनकी बेटी को ज्यादा दिक्कत नहीं होगी उसका उत्तर वैसे तो काफी हद तक मिल ही गया था मगर मानो ईश्वर को मेरा ऐसा सोचना रास नहीं आया था तो जैसे कह रहे हों ले देख इनकी कम परेशानी...
थेरपी खत्म होने के बाद जब वो बेटी को बाहर लायी तो झटका ही तो था वो उसकी गोद में लगभग छ साल की , दुबली पतली ,आँखों पर बड़ा सा चश्मा लगाए , शरीर पर कुछ अलग सी जेकेट ,पैरों में कुछ अलग जुते जो घूटनों से थोड़ा नीचे तक बांधे हुए थे उसके शरीर में एक ढ़ीलापन सा था हर्षिता का थोड़ा भी हाथ हिला तो वो झूल जाती थी कोई नियंत्रण नही था उसकी बॉडी पर, उसका हर्षिता की गोद में वो ऐसे दबकी हुई थी मानो पांच महीने की हो,एक हाथ गर्दन पर तो एक कमर पर उसको संभाले हुए ,वो तो चली गयी मगर एक अजीब सा दर्द मेरे मन में घुल गया था
धीरे धीरे हर्षिता से मिलने का सिलसिला हफ्ते में तीन दिन तय हो गया था ,जितना उसे जानती गयी उतना ही उसके लिए सम्मान बढ़ता गया | कभी किसी सॉफ्टवेयर कंपनी में काम करती थी मगर बेटी के जन्म के दो साल बाद सब कुछ बदल गया था इनके लिए,कभी किसी बात पर उसने कहा था कि जब बच्चे स्वस्थ और इंटेलीजेंट होते हैं ,तो वो सबके होते हैं,अगर कोई कमी है तो वो सिर्फ माँ के होते हैं,इस बात से समझ सकती थी मैं की घर में उसे किसी का सहयोग प्राप्त नहीं था शायद भोर को घर में ख़ुशी से अपनाया नहीं जा रहा था |
फिर भी उनकी बातों में एक ही सपना मुझे नज़र आता था की भोर बोल सके ,अपने पैरों पर खड़ी हो सके ,मेरी परी को इतनी तकलीफ नही थी तो भी मैँ कभी-कभी निराश हो जाती थी फिर उनका इतना विश्वास और सपने देखना ...हैरत में ही डालता था ,भोर एक स्पेशल बच्ची थी ,उसकी इन्द्रिया गर्म ठंडे का ज्ञान नही कर पाती थी उसे ये ज्ञान हो इसलिये दो टिफिन बना कर लाना ,ये भी थेरपी का एक हिस्सा था , ब्रश कराने से लेकर खाना खिलाना सारे काम हर्षिता खुद कर रही थी , इसके अलावा स्कूल में भोर के साथ बैठना ,फिर थेरपी आना,फिर फिजियोथेरेपी जाना....सुबह से शाम तक घडी की सुइयों जैसे घूमता जीवन....
हर माँ के कुछ सपने होते हैं ,मगर कुदरत कितनी क्रूर होती है कई बार ,अक्सर हार्षिता को देख के ये विचार आता ,जाने कितने सपने होंगे इसके पर आज चलने और बोलने के दायरे में ही सिमट गए से दिखते थे और ये भी मुझे तो रेगिस्तान में भटकते उस यात्री के से प्रतीत होते जो मृगतृष्णा में भटक रहा हो ,फिर भी हर्षिता को कभी परेशानी से ग्रस्त नही पाया, सिर्फ कर्म करते हुए देखा जिस भोर के शरीर में गुरूत्वाकर्षण के प्रति कोई प्रतिरोध नहीं था ,ज़िसके लिये सीधा बैठना और खड़े होना ही चुनौती से कम नहीं था वो चल सकेगी ये सिर्फ संशय को ही जन्म देता था | मगर एक माँ की आँखो में कभी संशय नहीं था, उसे देख कर कर्म -योगी शब्द के मायने समझ में आते थे ,वो लीन थी अपनी कर्म साधना में , निरपेक्ष भाव से , नकारात्मकता लेश मात्र भी नहीं थी ,थेरपी में जब खाली समय में बाकी लोग चिंता में लीन रहते ,वो अपनी किताबो में ,वो स्वयं बेहतर और बेहतर और बेहतर बनती जा रही थी अपनी दिशा के करीब और करीब और करीब ..... है ना निशी , उसके अंतस से ही मानो कोई आवाज गूंज उठी |
चार सालों की इस साधना की तो तुम ही साक्षी हो तो क्यो ये संशय ? ,भोर के कदमों में उसकी माँ का विश्वास ही तो ताकत भर रहा है ,अब सारे संशय दूर छिटक गए थे और शेष था एक विश्वास कि कोशिश के साथ सकारात्मक व्यवहार हो तो सब कुछ हो सकता है | भोर जो कभी लिक्विड फूड पर थी आज बादाम खा पा रही है, बोलने भी लगी थी हाँ ...थोड़ा रुक- रुक कर ,पर .....ये खाना ,बोलना एक बहुत बड़ी चुनौती ही थी जो एक माँ के सतत व सही दिशा में लिये गए प्रयासों से पार हो गयी | अब जब निशी भोर को देख रही थी कदम दर कदम बढते हुए, हर कदम के पीछे जो चेहरा उसे दिखायी दे रहा था ,जो सम्पूर्ण आभा से उजागार था वो सिर्फ माँ शब्द के भाव से दीप्त था |
भोर की हर सफलता निशी में भी कहीं ना कहीं जुगनु सा कुछ दमकाती ही रही थी | मगर आज पल-पल सकारात्मक भाव से जीते हुए हर्षिता ने भोर में तो ताकत भरी ही थी ,अंजाने ही निशी के भीतर के निराशा के अंधकार को ना केवल मिटा दिया था वरन् अपना यही योगी भाव उसमे भी दीप्त कर दिया था ,जहां किंचित मात्र भी हताशा को स्थान नहीं था | अंततः निशि ने समझ लिया था पल-पल करके बीतते इस जीवन में आप अपने लिए तो निश्चित ही कुछ गढ रहे होते हो अनजाने ही शायद किसी के जीवन में रंग भी भर रहे होते हो और अब निशि भी स्वयं के जीवन को इस नए रंग से सराबोर कर हर्षिता को उसकी सफलता की बधाई देने उठ खड़ी हुई |
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ReplyDeleteबहुत ही भावनात्मक और संजीदा कहानी इसके लिए आपको बहुत-बहुत साधुवाद
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद आपका
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