राम-राज्य बना सुघड़ बेशक,
सीता का मगर आहत था मान
निर्मिति चाही होगी ऐसे शासन की,
ना हो किसी सीता का फिर अपमान
तुम जैसे कहाँ है राघव,मगर............
जनता के दिलो- मस्तिष्क सुजान
नाम लेकर मर्यादा पुरुषोत्तम
तुम्हारा, शक-बीज पा रहा विस्तार
पहले एक थी सीता केवल,
आज कितनों के दामन आया तिरस्कार
व्यर्थ ही चुना खुद पर आघात को,
स्वयं का जीवन भी किया वीरान
होंगे एक अच्छे राजा तुम बेशक,
जन-मानसिकता का कर ना पाये भान
कल्पना राम राज्य की,देखो............
साथ तुम्हारे ही पा गयी विश्राम
आज तक नहीं मिल पाया
इस वसुधा को पुनः कोई राम
पुनः कोई राम..................
सारिका आशुतोष मूंदड़ा
सुंदर
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