उत्थान के नए सूर्योदय से अगर,
लुप्त हो जाए आदर्शों कि चमक
कैसे हो सकता है वो,
हमारे सपनो का भारत?
उन्नति का मानदंड हो केवल रुपया
चरित्र और मूल्यों का हास हो रहा,
ये कैसे हो सकता है,
गांधीजी का भारत?
यूँ तो पूजा जाता है कन्या -शक्ति को
और सहमी रहती हो जहाँ माँएं,
ये नहीं हो सकता
गौरवान्वित सा भारत
जो प्रखर-शक्ति है समाज की नीव की
वही युवा दिशाभ्रमित हो रहे यहाँ पर
क्या ये बना पाएंगे ,
बोस,आजाद,भगत सिंह का भारत?
राजनीती में लोप हो गया 'नीति का
स्वहित सर्वोपरि हुआ लोकहित से,
कैसे उड़ान भर पायेगा
शास्त्रीजी,पटेल का भारत?
जहाँ होती थी आत्मा पथ-प्रदर्शक कभी,
लथपथ है स्वार्थ के कीचड़ में अब जो,
कैसे बन पायेगा देश
विवेकानंद,टेरेसा का भारत?
साम्य हो पाये यदि मूल्यों और प्रगति का,
तब ही,केवल तब ही,स्वर्णिम इतिहास,
भावी पीढ़ी के लिए ,
लिख पायेगा भारत
आत्मा रूपी पहियों पर,लगाम नैतिकता की थाम के,
जो कर्म-रथ अग्रसर हो,शिखर के मार्ग पर,
विश्व -गुरु का पद,
पुनः पा सकता है भारत
सारिका आशुतोष मूंदड़ा
bahut badhiy.....a........
ReplyDeletethanks neetu
ReplyDeleteबहूत सुंदर शोध
ReplyDelete