लम्हा लम्हा सरकता रहा,
एक राह के संवारने को,
हर पल एक ईट बनता रहा,
राह के किनारे सजाता रहा
और .......................
कभी बना एक कुंआ आंसुओं का,
कभी सीढ़ियां बनी शरारतों की
कभी सज गयी मीनारें हंसी की,
कभी बने गुम्बद मासूमियत के,
इमारतें बनती गयी,रंग हमसे चुनती गयी,
लम्हे खिसकते गए,
जो भी बना ,जैसा भी बना,
बीत गया,............
हौले हौले खिसकता गया......
जैसे जल में अपना अक्स हुआ
छूना जिसे नामुमकिन हुआ
लम्हा लम्हा अब भी सरक रहा है
हर पल फिर एक ईट रख रहा है,
किनारे अब भी सज रहे हैं,
और सजावट के रंग ,
हम खुद ही तो चुन रहे हैं
तेजोमय या डबडबाये से,
कभी हंसी ,कभी आंसू के,
रंग भर रहे हैं
इमारतों की नीव ,
हम ही तो रख रहे हैं
पल जो भी है ,चला ही जाएगा
अपना अक्स फिर नजर आएगा
अक्स जैसा चाहिए,
रंग वैसा भरना होगा
दर्द भरोगे तो दर्द से मिलना होगा
हंसी भरोगे तो मुस्कान से मिलना होगा
चुनाव तो आखिर हमे ही करना होगा
सारिका आशुतोष मूंदड़ा
एक राह के संवारने को,
हर पल एक ईट बनता रहा,
राह के किनारे सजाता रहा
और .......................
कभी बना एक कुंआ आंसुओं का,
कभी सीढ़ियां बनी शरारतों की
कभी सज गयी मीनारें हंसी की,
कभी बने गुम्बद मासूमियत के,
इमारतें बनती गयी,रंग हमसे चुनती गयी,
लम्हे खिसकते गए,
जो भी बना ,जैसा भी बना,
बीत गया,............
हौले हौले खिसकता गया......
जैसे जल में अपना अक्स हुआ
छूना जिसे नामुमकिन हुआ
लम्हा लम्हा अब भी सरक रहा है
हर पल फिर एक ईट रख रहा है,
किनारे अब भी सज रहे हैं,
और सजावट के रंग ,
हम खुद ही तो चुन रहे हैं
तेजोमय या डबडबाये से,
कभी हंसी ,कभी आंसू के,
रंग भर रहे हैं
इमारतों की नीव ,
हम ही तो रख रहे हैं
पल जो भी है ,चला ही जाएगा
अपना अक्स फिर नजर आएगा
अक्स जैसा चाहिए,
रंग वैसा भरना होगा
दर्द भरोगे तो दर्द से मिलना होगा
हंसी भरोगे तो मुस्कान से मिलना होगा
चुनाव तो आखिर हमे ही करना होगा
सारिका आशुतोष मूंदड़ा
वाह क्या बात है दर्द भरोगे तो दर्द मिलेगा
ReplyDeleteवाह क्या बात है दर्द भरोगे तो दर्द मिलेगा
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