Tuesday, September 11, 2018

दुष्यंत कुमार


दुष्यंत कुमार (1 सितंबर 1933 --30 दिसम्बर 1975 )

हिन्दी के इस प्रथम गजल लेखक के अन्दाज और तेवर पर जाने कितने ही कवि और लेखक फिदा हैं ,उनके व्यक्तित्व  और गजल मे इस तेवर के बारे मे निदा फाजली जी लिखते हैं ....

"उनकी नज़र उनके युग की नई पीढ़ी के ग़ुस्से और नाराज़गी से सजी बनी है। यह ग़ुस्सा और नाराज़गी उस अन्याय और राजनीति के कुकर्मो के ख़िलाफ़ नए तेवरों की आवाज़ थी, जो समाज में मध्यवर्गीय झूठेपन की जगह पिछड़े वर्ग की मेहनत और दया की नुमानंदगी करती है। "

वर्तमान समय मे भी अगर जोश दिलाने के लिये,अत्याचारों के खिलाफ पंक्तियां बोली जाती हैं तो अनायास ही उनकी रचित  पंक्तियां सम्मुख आ जाती हैं ,याद कीजिये 'सत्यमेव जयते ' के शुरुआती गाने को, ज़िसमे अंत मे पंक्तियां आती हैं  --

सिर्फ हंगामा खडा करना मेरा मकसद नही,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए

मेरे सीने मे नही तो तेरे सीने मे सही ,
हो कहीं भी आग ,लेकिन आग जलनी चाहिए

 इन पंक्तियों के रचनाकार दुष्यंत कुमार त्यागी ,जिनका जन्म इसी महीने की पहली तारीख को 1933 मे हुआ , उत्तर प्रदेश के बिजनौर  जनपद का राजपुर नावादा गाँव सदा सदा के लिए गर्वित हो गया  इस महान रचनाकार के जन्म से ।उनके पिता श्री भगवतसहाय तथा माता श्रीमती राजकिशोरी थीं । उनकी प्रारम्भिक शिक्षा नहटौर, जनपद-बिजनौर में हुई ।उनके हाई स्कूल की परीक्षा एन॰एस॰एम॰ इन्टर कॉलेज चन्दौसी, जिला-मुरादाबाद से उत्तीर्ण की थी । उनका विवाह सन् 1949 में सहारनपुर जनपद निवासी श्री सूर्यभानु की सुपुत्री राजेश्वरी से हुआ । उन्होंने सन् 1954 में हिन्दी में एम॰ए॰ की उपाधि प्राप्त की ।
         सन् 1958 में आकाशवाणी दिल्ली में पटकथा लेखक के रूप में कार्य करते हुए सहायक निदेशक के पद पर उन्नत होकर सन् 1960 में भोपाल आ गये । साहित्य साधना स्थली भोपाल में 30 दिसम्बर 1975 में मात्र 42 वर्ष की अल्पायु में वे साहित्य जगत् से विदा हो गये ।
       दुष्यन्त कुमार त्यागी समकालीन हिन्दी कविता के एक ऐसे हस्ताक्षर हैं, जिन्होंने कविता, गीति नाट्‌य, उपन्यास आदि सभी विधाओं पर लिखा है । आपके उत्कृष्ट कार्यों को ध्यान मे रखते हुए भारतीय डाक विभाग ने 2009 मे एक डाक टिकट भी जारी किया। जब आपने साहित्य की दुनिया मे प्रवेश किया तो गजलों की दुनिया मे ताज भोपाली व कैफ भोपाली छाये
हुए थे ,ओर दुसरी तरफ अग्येय व मुक्तीबोध जैसे रचनाकार थे ,मगर उन्होने  लीक से हटकर अपनी बात कही ,उनकी  गज़लों ने हिन्दी  गज़ल को नया आयाम दिया । उर्दू गज़लों को नया परिवेश और नयी पहचान देते हुए उसे आम आदमी की संवेदना से जोड़ा ।गजल को पुराने बन्धन से मुक्त करने का श्रेय हिन्दी साहित्य मे आप को ही जाता है ,देखिये गालिब के दौर की गजल को क्या नया चोला उन्होने पहनाया है ...

मै ज़िसे ओढ़ता बिछाता हूँ ,
वो गजल आपको सुनाता हूँ ।

आम आदमी बदहाली में जीने की विवशता का अंकन देखिये ...

न हो तो कमीज तो पांवों से पेट ढक लेंगे,
ये लोग कितने मुनासिब है, इस सफर के लिए ।

आपने सच्चे अर्थों मे एक साहित्यकार की भूमिका अदा की ,फर्ज निभाया ,अपनी कलम व आवाज की ताकत से सरकारी नौकरी पर कार्यरत रहते हुए भी सरकार से सीधे टकराने की हिम्मत की ....

एक गुड़िया की कई कठपुतलियों में जान है,
आज शायर यह तमाशा देखकर हैरान है।

ख़ास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिए,
यह हमारे वक़्त की सबसे सही पहचान है।

कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए,
मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिन्दुस्तान है।

मुझमें रहते हैं करोड़ों लोग चुप कैसे रहूँ,
हर ग़ज़ल अब सल्तनत के नाम एक बयान है ...

तब का शायर ये कह रहा था ,अगर आज जो वो होते तो क्या कहते या  शायद तभी अपनी दुरंदेशी नजर से पहले ही कह गए ....

अब नयी तहजीब की पेशे नजर हम,
आदमी को भूनकर खाने लगे हैं ।

विनम्र श्रद्धांजली  ,शत शत नमन आपको !

आपकी रचनाये...

इन्होंने 'एक कंठ विषपायी' (काव्य नाटक), 'और मसीहा मर गया' (नाटक), 'सूर्य का स्वागत', 'आवाज़ों के घेरे', 'जलते हुए वन का बसंत', 'छोटे-छोटे सवाल' (उपन्यास), 'आँगन में एक वृक्ष, (उपन्यास), 'दुहरी जिंदगी' (उपन्यास), मन के कोण (लघुकथाएँ), साये में धूप (गजल) और दूसरी गद्य तथा कविता की किताबों का सृजन किया।

कविता  --  कहाँ तो तय था, कैसे मंजर ,खंडहर बचे हुए हैं ,दुहरी जिंदगी,जो शहतीर है ,ज़िंदगानी का कोई मकसद ,मुक्तक आज सड़कों पर लिखे हैं,मत कहो, आकाश में ,धूप के पाँव गुच्छे भर अमलतास ,सूर्य का स्वागत,आवाजों के घेरे ,जलते हुए वन का वसन्त ,आज सड़कों पर,आग जलती रहे,एक आशीर्वाद
आग जलनी चाहिए ,मापदण्ड बदलो ,कहीं पे धूप की चादर ,बाढ़ की संभावनाएँ ,हो गई है पीर पर्वत-सी,तू किसी रेल सी गुज़रती है

काव्य नाटिका--  एक कंठ  विषपायी
नाट्य गजल--और मसीहा मर गया,आवाज़ होनी चाहिए
छोटी कहानियाँ--मन के कोण,कौन कहता है आसमान में
उपन्यास ---छोटे-छोटे सवाल,आँगन में एक वृक्ष,दुहरी जिंदगी
नाट्य --और मसीहा मर गया
गजल --साये में धूप


सारिका आशुतोष मूंदड़ा

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