Tuesday, September 11, 2018

कुंठा के युग में अकुंठित कवि : कुँवर नारायण



कुँवर नारायण  ( 19 सितंबर 1927 ---15 नवंबर 2017)
"कविता मूलत : एक जैविक और सांस्कृतिक चेतना है ,ज़िसका विकास सीधी रेखा मे नही होता है | वह बहुदिशात्मक व विवृत्तमूलक ढंग से  सक्रिय रहती है ,दिक्काल मुक्त | "
काव्य के संदर्भ मे ये विचार हैं,आधुनिक काल के कवियों मे किसी भी वाद से रहित पद पर सुशोभित कवि कुंवर नारायण के |
        19 सितम्बर 1927 को एक ऐसे  व्यक्तित्व का आविर्भाव हुआ, जिसने मानवता के मूल्यों को  सींचा | उत्तर प्रदेश के जिला फैजाबाद  मे एक सम्पन्न परिवार  मे आपका जन्म हुआ |माँ और बहन की असमय मृत्यु के बाद लखनऊ मे रहे | आपने इंटर तक विज्ञान विषय से अपनी शिक्षा ग्रहण की ।फिर साहित्य मे रूचि के फलस्वरुप  लखनऊ से अंग्रेजी विषय मे एम .ए . किया । आपने अपने पैतृक व्यवसाय को भी अपनाया , जिसके पीछे मूल भावना  यही रही कि  साहित्य के प्रति  सम्पूर्ण  ईमानदारी  बरती  जा सके ,साहित्य का धन्धा ना करना  पड़े। आपकी छवि मुख्यत : एक कवि के रुप मे प्रसिद्ध रही है ,पर आपने कहानी ,चिंतनपरक व समीक्षात्मक लेख  भी लिखे हैं । आपने अंग्रेजी व हिन्दी दोनों भाषाओं मे सृजन किया । अपने काव्य का अनुवाद भी किया ।
      प्रथम काव्य संग्रह 'चक्रव्यूह ' से  ही आपने सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया । फिर अज्ञेय  द्वारा सम्पादित तृतीय तार सप्तक मे भी अपना एक विशिष्ट स्थान संजोया है । नयी कविता के आंदोलन के दौर मे उसके प्रभाव से  स्वयं को मुक्त रख कर अपनी एक अलग व सशक्त पहचान बनायी ।आपके काव्य मे अपने समकालीन कवियों की तरह ना ही कुंठा है ,ना ही हताशा है ,ना ही आत्मरति  ,वरन आपको अकुंठा  का कवि  कहा जाता है ,आप हताश होकर नफरत करने वाली परिस्थितियों से गुजरे हैं ,मगर नफरत को अपने जीवन मे स्थान नही देते ,आपके ही शब्दों मे.....
एक अजीब सी मुश्किल में हूं इन दिनों-
मेरी भरपूर नफरत कर सकने की ताकत
दिनों-दिन क्षीण पड़ती जा रही है
मुसलमानों से नफ़रत करने चलता
तो सामने ग़ालिब आकर खड़े हो जाते
अब आप ही बताइए किसी की कुछ चलती है
उनके सामने?
अंग्रेजों से नफ़रत करना चाहता
जिन्होंने दो सदी हम पर राज किया
तो शेक्सपियर आड़े आ जाते
जिनके मुझ पर न जाने कितने अहसान हैं
और वह प्रेमिका
जिससे मुझे पहला धोखा हुआ था
मिल जाए तो उसका खून कर दूं!
मिलती भी है, मगर
कभी मित्र, कभी मां, कभी बहन की तरह,
तो प्यार का घूंट पीकर रह जाता ....
दिनोंदिन मेरा ये प्रेम रोग बढता ही जा रहा है
और इस बहम ने पक्की ज़ड़ पकड ली है कि
यह प्रेम मुझे किसी दिन स्वर्ग दिखा कर ही रहेगा
            
             चाहे 'आत्मजयी' का नचिकेता हो या वाजश्रवा ..प्रत्येक साहित्य कर्म मानो तलाश है, जीवन की ,जीवन मूल्यों की ,अपनी सामर्थ्य  को पहचानने की ,विस्तार देने की । आत्मजयी' में  आप मृत्यु संबंधी शाश्वत समस्या को कठोपनिषद का माध्यम बनाकर अद्भुत व्याख्या के साथ हमारे सम्मुख उपस्थित होते हैं ।  वहीं नचिकेता मे एकदम विपरीत  प्रसंग लिए , नचिकेता अपने पिता की आज्ञा  को शिरोधार्य करके यम के द्वार पर चला जाता है, जहाँ वह तीन दिन तक भूखा-प्यासा रहकर यमराज के घर लौटने की प्रतीक्षा करता है। उसकी इस साधना से प्रसन्न होकर यमराज उसे तीन वरदान माँगने की अनुमति देते हैं। नचिकेता इनमें से पहला वरदान यह माँगता है कि उसके पिता वाजश्रवा का क्रोध समाप्त हो जाए। नचिकेता के इसी कथन को आधार बनाकर जो कृति 2008 में आई, 'वाजश्रवा के बहाने', उसमें उन्होंने पिता वाजश्रवा के मन के उद्वेलन को काव्यबद्ध किया है।  जहाँ एक ओर 'आत्मजयी' में कुँवरनारायण जी ने मृत्यु जैसे विषय का  चुना  है, वहीं  'वाजश्रवा के बहाने' कृति में अपनी संवेदना के साथ जीवन के आलोक को रेखांकित किया है।
पत्तों पर पानी गिरने का अर्थ
पानी पर पत्ते गिरने के अर्थ से भिन्न है।
जीवन को पूरी तरह पाने
और पूरी तरह दे जाने के बीच
एक पूरा मृत्यु-चिह्न है।
बाकी कविता
शब्दों से नहीं लिखी जाती,
पूरे अस्तित्व को खींचकर एक विराम की तरह
कहीं भी छोड़ दी जाती है...
सहज शब्द, गहन अर्थ ,यही है उनका रचना कर्म । उनका काव्य, एक अनवरत तलाश है ,विश्वास की ,मानवता के पक्ष मे जुडी आस्थाओं की । परिस्थितियों पर दोषारोपण करना सहज है , स्वविश्लेषण कर  मनुष्य होने की कसौटी पर  खरा उतरना मुश्किल है ,आप इसी मुश्किल  पथ के राही हैं ....
नही ,किसी और ने नही
मैने ही तोड़ दिया है कभी कभी
अपने को झूठे वादे की तरह
यह जानते  हुए भी कि  बार बार
लौटना है मुझे
प्रेम की तरफ
विश्वास बनाये रखना है
मनुष्य मे,
सिद्ध करते रहना है
कि मैं टूटा नही
ऐसे महान व्यक्तित्व को तो मृत्यु भी वरने ही आती है ,तोडने नही ,और  आपको ,आपको तो पुन: आना ही होगा, क्योंकि ....
ठूठ  होने लगी है ,
अपनी ज़मीन से  रस खींच सकने वाली सारी शक्तियां .....
आपको तो आना ही होगा, ताकि फिर से रचे  जा सके वाजश्रवा व नचिकेता  से काव्य, जहाँ बौद्धिकता भी है तो जीवन मूल्य भी ।
अतीत की जडों मे गहरे उतरकर वर्तमान के बीज के लिए रस की बूंदे तलाशनी पड़ती  हैं । बौद्धिकता के समक्ष जीवन मूल्यों का लोप ना हो सके , उतनी सम्नव्यता  तो आपके व्यक्तित्व मे ही लक्षित होती है । वैसे आपसा वृहत्तर , कृतज्ञतर , मनुष्यतर  खोजना मुश्किल है ,मगर फिर भी प्रतीक्षा है आपकी ,आपकी इन्हीं  पंक्तियों के साथ ...
अबकि अगर लौटा तो...
                 वृहत्तर लौटूँगा ,
                         कृतज्ञतर लौटूँगा
                                   मनुष्यतर  लौटूँगा
आपका रचना संसार ----
कविता संग्रह -
चक्रव्यूह (१९५६),
तीसरा सप्तक(१९५९),
परिवेश : हम-तुम(१९६१),
अपने सामने (१९७९),
कोई दूसरा नहीं(१९९३), साहित्य अकादमी पुरस्कार ,व्यास     सम्मान ,भवानी प्रसाद मिश्र पुरस्कार ,शतदल पुरस्कार
इन दिनों(२००२),
कविता के बहाने(१९९३)
खंड काव्य -
आत्मजयी (१९६५) ,हिन्दुस्तान अकादमी पुरस्कार
वाजश्रवा के बहाने (२००८)।
कहानी संग्रह -
आकारों के आसपास (१९७३) ,उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान का  'प्रेमचन्द  पुरस्कार '
समीक्षा विचार -
आज और आज से पहले(१९९८), मेरे साक्षात्कार (१९९९),
साहित्य के कुछ अन्तर्विषयक संदर्भ (२००३)
युग चेतना ,नया प्रतीक व छायानट  पत्रिकाओं के सम्पादक
मंडल मे शामिल
पुरस्कार /सम्मान --------
कुँवर नारायण को वर्ष 2005 के ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। छह अक्टूबर को राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने उन्हें देश के सबसे बड़े साहित्यिक सम्मान से सम्मानित किया।
साहित्य अकादमी पुरस्कार, व्यास सम्मान, कुमार आशान पुरस्कार, प्रेमचंद पुरस्कार, राष्ट्रीय कबीर सम्मान, शलाका सम्मान, मेडल ऑफ़ वॉरसा यूनिवर्सिटी, पोलैंड और रोम के अन्तर्राष्ट्रीय प्रीमियो फ़ेरेनिया सम्मान और २००९ में पद्मभूषण सम्मान से सम्मानित किया गया।


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