हर लम्हे के साथ,
सपनों की मुट्ठी से
फिसल रही है जिंदगी.......
हर शख्स बैठा है,
कुछ अधूरे सपनों,
कुछ हकीकतों के ढेर पर,
सोचता है फिर भी,
आशाओं की मरीचिका में,
कभी तो मुकम्मल रूप,
आखिर लेगी जिंदगी...........
भूल जाता है अक्सर,
मुकम्मल मिलती नहीं कभी ये,
मुकम्मल बनानी पड़ती है जिंदगी..........
सारिका आशुतोष मूंदड़ा
सपनों की मुट्ठी से
फिसल रही है जिंदगी.......
हर शख्स बैठा है,
कुछ अधूरे सपनों,
कुछ हकीकतों के ढेर पर,
सोचता है फिर भी,
आशाओं की मरीचिका में,
कभी तो मुकम्मल रूप,
आखिर लेगी जिंदगी...........
भूल जाता है अक्सर,
मुकम्मल मिलती नहीं कभी ये,
मुकम्मल बनानी पड़ती है जिंदगी..........
सारिका आशुतोष मूंदड़ा
सुंदर कविता
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